TransUnion CIBIL की एक नई रिपोर्ट ने गोल्ड लोन बाजार के लिए खतरे की घंटी बजा दी है। रिपोर्ट के अनुसार, 50% से अधिक कर्जदार 12 महीने के भीतर दोबारा लोन ले रहे हैं, जिससे कुल आउटस्टैंडिंग बैलेंस **₹22.5 लाख करोड़** के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है।
बढ़ता जोखिम और बदलता ट्रेंड
भारत के गोल्ड लोन सेक्टर में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। अगस्त 2026 तक गोल्ड लोन का कुल आउटस्टैंडिंग बैलेंस ₹22.5 लाख करोड़ तक पहुंच गया है। TransUnion CIBIL की रिपोर्ट के मुताबिक, गोल्ड लोन अब इमरजेंसी के बजाय एक 'रिकरिंग क्रेडिट प्रोडक्ट' (Recurring Credit Product) बनता जा रहा है।
आंकड़े बताते हैं कि ₹2.5 लाख से कम लोन लेने वाले 57% कर्जदार एक साल के भीतर ही दोबारा लोन के लिए वापस आ रहे हैं। जून 2026 की तिमाही में नए लोन लेने वालों की संख्या में 15% की गिरावट आई है, लेकिन लोन की वैल्यू 12% बढ़ी है। इसका मतलब साफ है कि अब लोग कम संख्या में लेकिन बड़े लोन ले रहे हैं।
बैंकों और NBFCs के लिए चेतावनी
जब कर्जदार बार-बार 'टॉप-अप' लोन लेते हैं, तो यह संकेत हो सकता है कि वे पुराने कर्ज चुकाने के लिए नए लोन का सहारा ले रहे हैं। इंडस्ट्री रिपोर्ट्स ने इस बात पर चिंता जताई है कि गोल्ड लोन का बड़ा हिस्सा उन लोगों को दिया जा रहा है जो पहले से ही अपने दूसरे कर्जों में डिफॉल्ट कर चुके हैं।
निवेशकों के लिए संकेत
हालांकि गोल्ड लोन एक सुरक्षित एसेट माना जाता है, लेकिन अगर कर्जदार इसे रोजमर्रा के खर्चों या पुराने कर्ज के लिए इस्तेमाल करेंगे, तो उन पर कर्ज का बोझ बढ़ेगा। गोल्ड की कीमतों में उतार-चढ़ाव या इनकम कम होने पर रिपेमेंट मुश्किल हो सकता है। कई लेंडर्स ने पहले ही 'स्टेज 2' और 'स्टेज 3' एसेट्स में देरी के संकेत दिए हैं। निवेशकों को अब इस सेक्टर के तिमाही नतीजों पर नजर रखनी चाहिए कि कंपनियां अपनी क्रेडिट असेसमेंट पॉलिसी को कितना सख्त कर रही हैं।
