भारतीय बैंकों में गोल्ड ज्वैलरी पर लोन 105% तक बढ़ गया है। यह परिवारों में बढ़ते वित्तीय दबाव का संकेत है। सोने की ऊंची कीमतें बड़े लोन की इजाजत देती हैं, लेकिन ग्रामीण इलाकों में बढ़ता कर्ज बताता है कि परिवार रोजमर्रा के खर्चों के लिए जूझ रहे हैं। निवेशकों को इस ट्रेंड पर नज़र रखनी चाहिए कि अगर सोने की कीमतों में गिरावट आई तो लोन डिफॉल्ट का क्या असर होगा।
गोल्ड लोन में क्यों आई बंपर तेजी?
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने देश के फाइनेंशियल सेक्टर में गोल्ड-बैक्ड लोन में हो रही तेज बढ़ोतरी पर चिंता जताई है। आंकड़ों के मुताबिक, नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनियों (NBFCs) में गोल्ड लोन 70% बढ़े हैं, वहीं बैंकों में यह आंकड़ा 105% तक पहुंच गया है। यह ग्रोथ रेट अर्थव्यवस्था में सामान्य क्रेडिट ग्रोथ से कहीं ज्यादा है।
सोने की बढ़ती कीमतों का असर
इस तेजी का सबसे बड़ा कारण सोने की कीमतों में आई हालिया उछाल है। जैसे-जैसे सोने की कीमत बढ़ी है, कर्ज लेने वाले अपनी ज्वैलरी पर ज्यादा लोन ले पा रहे हैं। हालांकि, यह बढ़ी हुई लोन लेने की क्षमता असल में वित्तीय दबाव को छिपा रही है। कई लोग इन लोनों का इस्तेमाल नए निवेश के लिए नहीं, बल्कि मौजूदा कर्ज को चुकाने या रोजमर्रा के खर्चों को पूरा करने के लिए कर रहे हैं। यह दिखाता है कि सोने को, जिसे पारंपरिक रूप से पारिवारिक संपत्ति माना जाता है, अब तत्काल नकदी के स्रोत के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है।
ग्रामीण इलाकों पर दबाव
गोल्ड-बैक्ड क्रेडिट में यह उछाल खासकर ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में ज्यादा देखने को मिल रहा है। इन इलाकों में महंगाई और अनिश्चित कृषि उपज ने लोगों की डिस्पोजेबल इनकम पर असर डाला है। जब घर की आमदनी बढ़ती महंगाई का मुकाबला नहीं कर पाती, तो परिवार खर्चों को पूरा करने के लिए अपनी संपत्ति बेचते हैं या गिरवी रखते हैं। भारत का हाउसहोल्ड डेट मार्च 2026 तक जीडीपी का लगभग 45.5% पहुंच जाने की उम्मीद है, ऐसे में गोल्ड-बैक्ड लोन पर निर्भरता बताती है कि कई परिवारों के पास सीमित वित्तीय सुरक्षा बची है।
वित्तीय स्थिरता के लिए संभावित जोखिम
लेंडर्स के लिए, गोल्ड लोन का यह बूम कुछ खास जोखिम लेकर आया है। सबसे बड़ी चिंता कोलैटरल वैल्यू (गिरवी रखी गई संपत्ति का मूल्य) में अस्थिरता है। अगर सोने की कीमतों में अचानक बड़ी गिरावट आती है, तो बैंकों और NBFCs की सुरक्षा का मूल्य कम हो जाएगा। इससे न केवल इन लोन पोर्टफोलियो की सुरक्षा मार्जिन घटेगी, बल्कि अगर कर्जदार मार्जिन कॉल पूरा नहीं कर पाते हैं तो डिफॉल्ट की एक लहर भी शुरू हो सकती है। रेगुलेटर्स इस बात पर नजर रख रहे हैं कि क्या मौजूदा अंडरराइटिंग स्टैंडर्ड्स, संपत्ति के मूल्य में गिरावट की स्थिति को संभालने के लिए काफी मजबूत हैं।
निवेशकों को क्या देखना चाहिए?
निवेशकों के लिए सबसे अहम बात यह है कि वे आने वाली तिमाही रिपोर्टों में इन लोन बुक्स की क्वालिटी पर ध्यान दें। एनालिस्ट इस बात पर फोकस करेंगे कि क्या लेंडर्स प्राइस स्विंग्स से बचाने के लिए कंजरवेटिव लोन-टू-वैल्यू रेशियो बनाए रख रहे हैं। इसके अलावा, ग्रामीण कर्जदारों के रीपेमेंट व्यवहार पर मैनेजमेंट की टिप्पणी यह निर्धारित करने में महत्वपूर्ण होगी कि क्या यह ग्रोथ टिकाऊ है या छिपे हुए बैड लोन का निर्माण हो रहा है। अगर डिफॉल्ट बढ़ने लगते हैं, तो गोल्ड लोन सेगमेंट में भारी एक्सपोजर वाले लेंडर्स को प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव और एसेट क्वालिटी से जुड़ी चिंताएं झेलनी पड़ सकती हैं।
