Gold Loan: RBI के नए नियमों का दिखा असर, गोल्ड लोन की रफ्तार में आई सुस्ती

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AuthorAditi Chauhan|Published at:
Gold Loan: RBI के नए नियमों का दिखा असर, गोल्ड लोन की रफ्तार में आई सुस्ती

जुलाई 2026 तक गोल्ड लोन में ग्रोथ घटकर **88.1%** रह गई है, जो पिछले साल इसी अवधि में **136.4%** थी। RBI के नए सख्त नियमों और LTV लिमिट में बदलाव के कारण बैंक अब अपने गोल्ड लोन पोर्टफोलियो को री-एडजस्ट कर रहे हैं।

रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के नए दिशा-निर्देशों के बाद बैंकों की गोल्ड लेंडिंग में बदलाव साफ दिख रहा है। 31 जुलाई 2026 तक, बैंकों का गोल्ड लोन पोर्टफोलियो सालाना आधार पर 88.1% बढ़कर ₹5.52 लाख करोड़ हो गया है। हालांकि यह आंकड़ा काफी बड़ा है, लेकिन पिछले साल की 136.4% की तेज ग्रोथ के मुकाबले इसमें गिरावट आई है। यह बदलाव अप्रैल 2026 में लागू हुए उस नए फ्रेमवर्क का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य बैंकिंग सेक्टर में लोन प्रक्रिया को अधिक व्यवस्थित बनाना है।

नए लेंडिंग नियमों का असर

RBI ने अब लोन-टू-वैल्यू (LTV) रेश्यो के लिए एक टियर्ड (Tiered) सिस्टम लागू किया है। अब ₹2.5 लाख तक के लोन पर बैंक गोल्ड वैल्यू का 85% तक कर्ज दे सकते हैं, ₹2.5 लाख से ₹5 लाख के बीच यह लिमिट 80% है, और ₹5 लाख से ज्यादा के लोन पर यह 75% है। पुराने नियमों में यह लिमिट फिक्स्ड 75% थी। इसके अलावा, रेगुलेटर ने बुलेट रिपेमेंट लोन की अवधि को अधिकतम 12 महीने तक सीमित कर दिया है।

इन बदलावों के चलते बैंकों के ऑपरेशनल खर्च में बढ़ोतरी की उम्मीद है, क्योंकि अब उन्हें गोल्ड की शुद्धता की अनिवार्य जांच और नीलामी प्रक्रियाओं का सख्ती से पालन करना होगा। बैंकों को अपने एसेट क्वालिटी पर भी बारीक नजर रखनी होगी।

ओवरऑल क्रेडिट मार्केट का हाल

गोल्ड लोन में सुस्ती के बावजूद, भारतीय रिटेल क्रेडिट मार्केट अभी भी मजबूत बना हुआ है। जुलाई के अंत तक कुल बैंक क्रेडिट ₹220.8 लाख करोड़ तक पहुंच गया है, जो 19.3% की सालाना ग्रोथ दर्शाता है। पर्सनल लोन सेगमेंट 16.2% की दर से बढ़ा है। वहीं, होम लोन में 11.3% की बढ़त के साथ यह आंकड़ा ₹34.3 लाख करोड़ और व्हीकल लोन 18.8% की ग्रोथ के साथ ₹7.65 लाख करोड़ पर पहुंच गया है।

निवेशकों के लिए क्या है संकेत?

निवेशकों को अब इस बात पर नजर रखनी चाहिए कि बैंक और NBFCs नए नियमों के दायरे में अपने मार्जिन को कैसे बनाए रखते हैं। गोल्ड की कीमतों में उतार-चढ़ाव भी एक बड़ा फैक्टर है, क्योंकि अगर कीमतें गिरती हैं, तो LTV रेश्यो पर दबाव बनेगा और ग्राहकों को अतिरिक्त कोलैटरल (Collateral) देना पड़ सकता है।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.