भारत में गोल्ड लोन (Gold Loan) की मांग आसमान छू रही है! Q4 FY26 में डिस्बर्समेंट बढ़कर **₹981 करोड़** हो गया है। सोने के बढ़ते दामों के कारण लोग अब ज्यादा लोन ले पा रहे हैं। हालांकि, एक्सपर्ट्स का कहना है कि सिर्फ ज्यादा लोन लेने की बजाय, आपको अलग-अलग बैंकों और NBFCs के ब्याज दरों और रीपेमेंट प्लान की तुलना जरूर करनी चाहिए।
गोल्ड लोन में आई तूफानी तेजी
भारत के रिटेल क्रेडिट मार्केट में गोल्ड लोन का दबदबा साफ दिख रहा है। हालिया आंकड़ों के मुताबिक, FY26 की चौथी तिमाही (Q4 FY26) में गोल्ड लोन के डिस्बर्समेंट बढ़कर ₹981 करोड़ हो गए। यह आंकड़ा दो साल पहले यानी Q4 FY24 के ₹483 करोड़ के मुकाबले दोगुना से भी ज्यादा है। इस बंपर ग्रोथ की एक बड़ी वजह पिछले 5 सालों में ग्लोबल गोल्ड प्राइस में आई करीब 130% की उछाल है। सोने के दाम बढ़ने से लोगों के पास रखे सोने के गहनों की वैल्यू बढ़ गई है, जिससे वे ज्यादा लोन ले पा रहे हैं।
रिटेल क्रेडिट में आया बड़ा बदलाव
Experian के आंकड़ों से पता चलता है कि गोल्ड लोन अब एक खास तरह का प्रोडक्ट नहीं रह गया है, बल्कि यह रिटेल क्रेडिट बढ़ाने का एक मुख्य जरिया बन गया है। कुल रिटेल लोन पोर्टफोलियो में इसका हिस्सा FY23 में 18% था, जो बढ़कर FY26 तक 41% तक पहुंच गया है। Equifax की एक और खास बात यह है कि इन डिस्बर्समेंट का लगभग 98% मौजूदा ग्राहकों को ही दिया जा रहा है। इससे पता चलता है कि लोग इस चैनल पर भरोसा करते हैं और बार-बार इसका इस्तेमाल कर रहे हैं।
लोन का असली खर्च
हालांकि, ज्यादा लोन मिलने की बात तो साफ है, लेकिन फाइनेंशियल एनालिस्ट्स इस बात पर जोर देते हैं कि कई लोग लोन की कुल लागत को नजरअंदाज कर देते हैं। आम तौर पर बैंक गोल्ड लोन पर 8% से 11% तक ब्याज लेते हैं, जबकि नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनियां (NBFCs) 9% से 18% तक चार्ज कर सकती हैं। बेस इंटरेस्ट रेट के अलावा, प्रोसेसिंग फीस, वैल्यूएशन चार्ज और रिन्यूअल पेनल्टी जैसे छिपे हुए खर्चे भी कुल लागत को बढ़ा सकते हैं। एक्सपर्ट्स का कहना है कि लोन फाइनल करने से पहले, ग्राहकों को असली खर्च को समझने के लिए एनुअल परसेंटेज रेट (APR) की तुलना जरूर करनी चाहिए।
रीपेमेंट और रेगुलेटरी बदलाव
सही रीपेमेंट प्लान चुनना उतना ही जरूरी है जितना कि ब्याज दर। कर्जदार रेगुलर मंथली ईएमआई (EMI) या बुलेट रीपेमेंट स्कीम चुन सकते हैं, जिसमें लोन की पूरी रकम आखिर में एक साथ चुकानी होती है। यह ध्यान रखना जरूरी है कि अप्रैल 2026 में रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) ने एक नया नियम लागू किया है, जिसके तहत बुलेट रीपेमेंट की अवधि मैक्सिमम 12 महीने तक सीमित कर दी गई है। इस कदम का मकसद क्रेडिट डिसिप्लिन बनाए रखना है।
निवेशकों के लिए क्या है खास?
फाइनेंशियल सेक्टर पर नजर रखने वाले लोगों के लिए, यह देखना अहम होगा कि NBFCs और बैंक इस तेजी से बढ़ते क्रेडिट के साथ जुड़े जोखिम को कैसे मैनेज करते हैं। RBI के मौजूदा दिशानिर्देशों के अनुसार, डिफॉल्ट हुए लोन की पब्लिक नीलामी की जानी चाहिए, जिसमें रिजर्व प्राइस सोने के वैल्यू का मिनिमम 90% रखा जाएगा। नीलामी से होने वाला कोई भी अतिरिक्त पैसा कर्जदार को वापस किया जाएगा। निवेशकों को यह ट्रैक करना चाहिए कि क्या कर्ज देने वाली संस्थाएं गहनों के स्टोरेज प्रोटोकॉल को मजबूत रखती हैं और वे तेजी से ग्रोथ के साथ-साथ ग्राहकों को जरूरत से ज्यादा कर्ज लेने से रोकने के बीच संतुलन कैसे बनाती हैं।
