Go Digit के चेयरमैन की बड़ी मांग: हॉस्पिटल बिलिंग और खर्चों के नियमों में हो बदलाव

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AuthorNeha Patil|Published at:
Go Digit के चेयरमैन की बड़ी मांग: हॉस्पिटल बिलिंग और खर्चों के नियमों में हो बदलाव

Go Digit के चेयरमैन Kamesh Goyal ने हेल्थ इंश्योरेंस सेक्टर में बड़े सुधार की मांग की है। उनका कहना है कि हॉस्पिटल बिलिंग को स्टैंडर्डाइज करना और एक्सपेंस मैनेजमेंट नियमों में बदलाव करना समय की मांग है, ताकि मेडिकल इन्फ्लेशन के असर को कम किया जा सके।

Go Digit General Insurance के चेयरमैन Kamesh Goyal ने भारतीय हेल्थ इंश्योरेंस इंडस्ट्री की कार्यप्रणाली में बड़े बदलाव का आह्वान किया है। उनका मानना है कि केवल प्रीमियम बढ़ाने या ग्राहकों पर को-पेमेंट का बोझ डालने से मेडिकल इन्फ्लेशन और हॉस्पिटल के अनिश्चित खर्चों जैसी समस्याओं का समाधान नहीं होगा। इसके बजाय, सेक्टर की स्थिरता के लिए हॉस्पिटल बिलिंग का मानकीकरण (Standardization) और प्रोडक्ट स्ट्रक्चर को सरल बनाना बेहद जरूरी है।\n\n### निवेशकों के लिए क्यों है अहम?\n\nइन्वेस्टर्स के लिए यह खबर जनरल इंश्योरेंस स्पेस की एक बड़ी चुनौती को उजागर करती है—और वह है क्लेम की बढ़ती लागत। इंश्योरेंस कंपनियां अपने 'लॉस रेशियो' (Loss Ratio) पर टिकी होती हैं। जब हॉस्पिटलों में मेडिकल खर्च तेजी से बढ़ते हैं या बिलिंग में पारदर्शिता की कमी होती है, तो कंपनियों को उम्मीद से ज्यादा क्लेम चुकाने पड़ते हैं। अगर बिलिंग फॉर्मेट स्टैंडर्डाइज हो जाए, तो कंपनियां क्लेम को ज्यादा सटीकता से प्रोसेस कर सकेंगी, जिससे लागत पर लगाम लग सकती है।\n\n### एक्सपेंस रेगुलेशन पर बहस\n\nएक और महत्वपूर्ण मुद्दा 'Expenses of Management' (EOM) का है। IRDAI तय करता है कि कंपनियां पॉलिसी खरीदने और सर्विस देने पर कितना खर्च कर सकती हैं। Goyal का कहना है कि ये नियम रिटेल-केंद्रित इंश्योरेंस कंपनियों के लिए चुनौती पैदा करते हैं, क्योंकि रिटेल ग्राहकों को एक्वायर करना और सर्विस देना कॉर्पोरेट या सरकारी क्लाइंट्स के मुकाबले ज्यादा महंगा होता है। उन्होंने सुझाव दिया कि रेगुलेटर को फिक्स्ड आउटकम के बजाय सिद्धांत-आधारित (Principle-based) निगरानी मॉडल अपनाना चाहिए।\n\n### प्रोडक्ट जटिलता का मुद्दा\n\nहॉस्पिटल और खर्चों के अलावा, इंश्योरेंस प्रोडक्ट्स को सरल बनाने पर भी जोर दिया गया है। फिलहाल, कई पॉलिसीज इतनी जटिल हैं कि ग्राहकों को उनका सही लाभ समझ नहीं आता। एक स्टैंडर्ड बेस पॉलिसी और स्पष्ट प्राइसिंग से बार-बार प्रीमियम बढ़ाने की जरूरत कम हो सकती है। आगे चलकर, निवेशकों की नजर इस बात पर होगी कि रेगुलेटर कंज्यूमर प्रोटेक्शन और कंपनियों की ऑपरेशनल लागत के बीच कैसे संतुलन बिठाता है।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.