FICCI-IBA के नए सर्वे में बड़ी बात सामने आई है। **61%** बैंक मानते हैं कि प्राइवेट निवेश में कमी की असली वजह ब्याज दरें नहीं, बल्कि जियोपॉलिटिकल तनाव और सप्लाई-चेन की दिक्कतें हैं। इसके बावजूद, बैंकिंग सेक्टर में क्रेडिट ग्रोथ को लेकर उम्मीदें कायम हैं।
भारत के बैंकिंग सेक्टर से एक दिलचस्प रिपोर्ट सामने आई है। फेडरेशन ऑफ इंडियन चैम्बर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (FICCI) और इंडियन बैंक्स एसोसिएशन (IBA) का मानना है कि कंपनियां नए बड़े प्रोजेक्ट्स शुरू करने से इसलिए बच रही हैं क्योंकि ग्लोबल स्तर पर अनिश्चितता बहुत ज्यादा है। सर्वे में शामिल 61% बैंकर्स ने माना है कि जियोपॉलिटिकल टेंशन और सप्लाई-चेन का अस्थिर होना प्राइवेट कैपिटल एक्सपेंडिचर (Capex) के रास्ते में सबसे बड़ा रोड़ा है। इससे यह साफ होता है कि अगर ब्याज दरें कम भी हो जाएं, तो भी कंपनियां जब तक ग्लोबल माहौल ठीक नहीं होता, बड़े निवेश में सावधानी बरतेंगी।
सरकारी बैंकों की सतर्कता
सर्वे में 22 बैंकों को शामिल किया गया था, जो देश की कुल बैंकिंग एसेट्स का 78% हिस्सा कवर करते हैं। इसमें एक गौर करने वाली बात यह है कि सरकारी बैंक अधिक सतर्क हैं। 75% सरकारी बैंकों ने माना कि अंतरराष्ट्रीय अस्थिरता के कारण वे बड़े प्रोजेक्ट्स को लोन देने में सावधानी बरत रहे हैं। चूँकि देश के अधिकांश कॉर्पोरेट लोन सरकारी बैंकों के पास हैं, इसलिए बड़े इंडस्ट्रियल प्रोजेक्ट्स की रफ्तार उम्मीद से धीमी रह सकती है।
क्रेडिट ग्रोथ में अभी भी दम
बड़ी परियोजनाओं को लेकर भले ही सुस्ती हो, लेकिन बैंकों का क्रेडिट पोर्टफोलियो मजबूत है। सर्वे के अनुसार, 95% बैंक उम्मीद कर रहे हैं कि अगले 6 महीनों में इंडस्ट्रियल क्रेडिट 9% से अधिक की दर से बढ़ेगा। इसमें इंफ्रास्ट्रक्चर, इंजीनियरिंग और ऑटोमोटिव सेक्टर से भारी डिमांड आ रही है।
वहीं, सर्विसेज सेक्टर में स्थिति और भी बेहतर है। आधे बैंकों को उम्मीद है कि सर्विसेज सेक्टर में क्रेडिट ग्रोथ 15% के आंकड़े को पार कर सकती है, जबकि पूरे सेक्टर के लिए यह ग्रोथ 13% से ज्यादा रहने का अनुमान है। इसका मतलब साफ है कि कंपनियां नए बड़े प्रोजेक्ट्स में पैसा लगाने के बजाय अपने मौजूदा कामकाज को चलाने और विस्तार करने के लिए लोन ले रही हैं।
