General Insurance Council ने रिटेल हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसियों में **10%** अनिवार्य को-पेमेंट (co-payment) का प्रस्ताव रखा है। इस कदम का मकसद क्लेम की बढ़ती संख्या को रोकना है, लेकिन जानकारों का मानना है कि इससे ग्राहकों पर आर्थिक बोझ बढ़ेगा।
General Insurance Council की ओर से आया यह प्रस्ताव पॉलिसीहोल्डर्स के लिए एक बड़ा बदलाव साबित हो सकता है। इसके तहत, मरीज को अपने कुल मेडिकल बिल का 10% हिस्सा खुद चुकाना होगा, जिसके बाद ही इंश्योरेंस कंपनी बाकी का भुगतान करेगी। काउंसिल का तर्क है कि इससे गैर-जरूरी क्लेम्स पर लगाम लगेगी और कंपनियां अपने लॉस रेशियो को बेहतर ढंग से मैनेज कर पाएंगी।
क्यों हो रहा है इस फैसले का विरोध?
आंकड़े बताते हैं कि फाइनेंशियल ईयर 2018-19 से 2024-25 के बीच हेल्थ इंश्योरेंस प्रीमियम में 140% का भारी उछाल आया है। विशेषज्ञों का कहना है कि को-पेमेंट थोपने से पहले सिस्टम की बुनियादी खामियों, जैसे कि अस्पतालों की मनमानी बिलिंग और प्रोसीजर की बढ़ती कीमतों पर लगाम लगानी चाहिए।
डिस्ट्रीब्यूशन कॉस्ट का बड़ा मुद्दा
विरोध का एक बड़ा कारण ब्रोकर्स का कमीशन भी है। साल 2023 से 2025 के बीच रिटेल हेल्थ इंश्योरेंस प्रोडक्ट्स पर ब्रोकर कमीशन 10% से बढ़कर 30% हो गया है, जो कि 118% की बढ़ोतरी है। आलोचकों का मानना है कि को-पेमेंट लाकर ग्राहकों पर बोझ डालने के बजाय, इन बढ़ते डिस्ट्रीब्यूशन खर्चों पर ध्यान देने की जरूरत है।
क्या है रिस्क?
इस बदलाव से 'एडवर्स सिलेक्शन' का खतरा भी पैदा हो सकता है। यदि को-पेमेंट के कारण इंश्योरेंस महंगा महसूस हुआ, तो स्वस्थ लोग बाजार से बाहर हो सकते हैं। इससे इंश्योरेंस पूल में केवल बीमार लोगों की संख्या बढ़ जाएगी, जिससे भविष्य में प्रीमियम और भी ज्यादा महंगा हो सकता है। अब पूरी नजर इस पर है कि रेगुलेटर्स इस पर क्या रुख अपनाते हैं और क्या वे बिना ग्राहकों को परेशान किए कोई बीच का रास्ता निकाल पाते हैं।
