General Insurance Council का बड़ा खुलासा: बुखार में Admit होने के नियम पर दी अहम जानकारी

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AuthorMehul Desai|Published at:
General Insurance Council का बड़ा खुलासा: बुखार में Admit होने के नियम पर दी अहम जानकारी

General Insurance Council (GIC) ने हाल ही में बुखार से संबंधित हॉस्पिटलाइजेशन (Hospitalization) को लेकर जारी की गई अपनी एडवाइजरी (Advisory) पर अहम स्पष्टीकरण दिया है। काउंसिल ने साफ किया है कि यह कोई बंधनकारी (Binding) नियम नहीं है, बल्कि एक फ्रेमवर्क (Framework) है। इसका मकसद अनावश्यक हॉस्पिटलाइजेशन को कम करना और हेल्थ क्लेम्स (Healthcare Claims) को मैनेज करना है। 2024-25 में ये क्लेम्स **₹94,000 करोड़** से ऊपर पहुंच गए थे।

ये नियम क्यों लाए गए?

General Insurance Council (GIC) ने 3 अगस्त, 2026 को बुखार और संक्रामक रोगों से जुड़े हॉस्पिटलाइजेशन के लिए गाइडलाइन्स (Guidelines) जारी की थीं। काउंसिल ने अब स्पष्ट किया है कि ये गाइडलाइन्स एक एविडेंस-बेस्ड (Evidence-based) फ्रेमवर्क के तौर पर काम करेंगी, न कि किसी मैंडेटरी (Mandatory) निर्देश के रूप में। इस पहल का मुख्य उद्देश्य इंश्योरेंस (Insurance) प्रैक्टिसेज को इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR) और मिनिस्ट्री ऑफ हेल्थ एंड फैमिली वेलफेयर (MoHFW) द्वारा तय किए गए ट्रीटमेंट प्रोटोकॉल्स (Treatment Protocols) के साथ अलाइन (Align) करना है।

बढ़ते हेल्थ क्लेम्स पर लगाम?

हेल्थ इंश्योरेंस इंडस्ट्री (Health Insurance Industry) इस समय क्लेम्स में भारी उछाल के दबाव का सामना कर रही है। फाइनेंशियल ईयर 2024-25 में हेल्थ इंश्योरेंस क्लेम्स ₹94,247.6 करोड़ तक पहुंच गए थे। कैशलेस हॉस्पिटलाइजेशन (Cashless Hospitalizations) अब कुल एडमिशन का 66.4% हो गया है। GIC ने बताया कि इंडस्ट्री में हल्के बुखार के लिए बार-बार हॉस्पिटलाइजेशन, बेवजह डायग्नोस्टिक टेस्टिंग (Diagnostic Testing) और बिना मेडिकल जस्टिफिकेशन (Medical Justification) के लंबे समय तक एडमिट रहने के मामले सामने आ रहे हैं।

मेडिकल ऑटोनॉमी (Medical Autonomy) और लागत पर असर

मेडिकल प्रोफेशनल्स (Medical Professionals) द्वारा ट्रीटमेंट में संभावित हस्तक्षेप को लेकर जताई गई चिंताओं के बाद, GIC ने साफ किया कि डॉक्टर अभी भी पेशेंट के एडमिशन के संबंध में पूरा फैसला लेने के लिए स्वतंत्र हैं। जब तक एडमिशन की क्लीनिकल नेसेसिटी (Clinical Necessity) डॉक्यूमेंटेड (Documented) है, तब तक इंश्योरेंस फ्रेमवर्क डॉक्टर की प्रोफेशनल ऑटोनॉमी का सम्मान करेगा। काउंसिल ने यह भी कहा कि अनावश्यक हॉस्पिटलाइजेशन से हॉस्पिटल-एक्वायर्ड इन्फेक्शन्स (Hospital-acquired Infections), मरीजों पर भारी फाइनेंशियल बोझ और प्रीमियम में बढ़ोतरी हो सकती है। ऐसे एडमिशन को रोककर, इंश्योरेंस सेक्टर हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसीज (Health Insurance Policies) की सस्टेनेबिलिटी (Sustainability) को बेहतर बनाने और जरूरतमंद मरीजों के लिए रिसोर्सेज (Resources) को निर्देशित करने का लक्ष्य रखता है।

ग्लोबल स्टैंडर्ड्स (Global Standards) के अनुरूप

GIC ने इस बात पर जोर दिया कि यह अप्रोच (Approach) भारत की इंश्योरेंस प्रैक्टिसेज को यूनाइटेड स्टेट्स (United States), यूनाइटेड किंगडम (United Kingdom), ऑस्ट्रेलिया (Australia), कनाडा (Canada) और जर्मनी (Germany) जैसे विकसित बाजारों के साथ अलाइन करता है। इन देशों में, इंश्योरर्स अक्सर हेल्थकेयर डिलीवरी (Healthcare Delivery) को कुशलतापूर्वक मैनेज करने के लिए सरकारी क्लीनिकल गाइडलाइन्स का इस्तेमाल करते हैं। भारतीय निवेशकों और पॉलिसीहोल्डर्स (Policyholders) के लिए, यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि यह फ्रेमवर्क क्वालिटी हेल्थकेयर (Quality Healthcare) की पहुंच को प्रभावित किए बिना गैर-जरूरी क्लेम्स की फ्रीक्वेंसी (Frequency) को सफलतापूर्वक कम कर पाता है या नहीं। GIC से भविष्य में आने वाले अपडेट्स, खासकर डायग्नोस्टिक प्रोटोकॉल्स (Diagnostic Protocols) में किसी भी एडजस्टमेंट (Adjustment) या हेल्थ इंश्योरेंस कंपनियों के लिए ओवरऑल क्लेम रेश्यो (Claim Ratio) पर इन गाइडलाइन्स के प्रभाव पर नजर रखना अहम होगा।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.