GST Council की **8 अक्टूबर** को होने वाली बैठक में NBFCs और बैंकों के बीच को-लेंडिंग (co-lending) मॉडल पर मिलने वाली सर्विस फीस पर **18%** GST लगाने पर चर्चा हो सकती है। हालांकि ब्याज से होने वाली इनकम टैक्स फ्री रहेगी, लेकिन इस फैसले से NBFCs के मार्जिन पर सीधा असर पड़ सकता है।
को-लेंडिंग मॉडल पर टैक्स का पेंच
GST काउंसिल की 57वीं बैठक में को-लेंडिंग व्यवस्था को लेकर टैक्स नियमों पर स्पष्टता आने की उम्मीद है। फिटमेंट कमेटी ने सिफारिश की है कि जब NBFCs किसी बैंक के साथ मिलकर लोन बांटती हैं, तो उस दौरान मिलने वाली सर्विस फीस पर 18% GST लगाया जाए। अभी तक यह स्पष्ट नहीं था कि को-लेंडिंग में मिलने वाला 'प्रॉफिट स्प्रेड' ब्याज (जो टैक्स फ्री है) माना जाए या सर्विस के बदले फीस।
निवेशकों के लिए क्या हैं मायने?
यह फैसला विवादों को खत्म करने और RBI के नियमों के साथ टैक्स वैल्यूएशन को जोड़ने के लिए लिया जा रहा है। हालांकि, निवेशकों के लिए इसके दो बड़े पहलू हैं:
- मार्केट मार्जिन पर दबाव: अगर NBFCs इस 18% के टैक्स बोझ को अपने पार्टनर बैंकों पर नहीं डाल पाती हैं, तो इससे उनके नेट इंटरेस्ट मार्जिन पर असर पड़ेगा।
- ऑपरेशनल बदलाव: कंपनियों को अपने IT और फाइनेंशियल सिस्टम्स को RBI की नई वैल्यूएशन पद्धति के अनुसार अपडेट करना होगा, जिससे compliance cost बढ़ेगी।
फिलहाल, मार्केट की नजर इस बात पर है कि क्या काउंसिल की तरफ से ट्रांजिशन पीरियड या कोई खास राहत दी जाती है। निवेशकों को आधिकारिक नोटिफिकेशन का इंतजार करना चाहिए ताकि वे यह समझ सकें कि उनके पोर्टफोलियो की NBFC कंपनियों पर इसका कितना गहरा असर होगा।
