GIFT City के लिए अंतरराष्ट्रीय ब्रोकर्स को आकर्षित करना एक बड़ी चुनौती बन गया है। कड़े ट्रेड-बाय-ट्रेड रिपोर्टिंग नियमों और आसान अकाउंट स्ट्रक्चर की कमी के कारण विदेशी कंपनियां यहां आने से हिचकिचा रही हैं, जिसका असर भारतीय निवेशकों पर पड़ रहा है।
भारत के फाइनेंशियल हब के रूप में उभर रहे GIFT City के सामने अपनी राह को आसान बनाने की बड़ी चुनौती है। हालांकि जुलाई 2026 तक यहां ग्लोबल एक्सेस प्रोवाइडर्स की संख्या 18 तक पहुंच गई है, लेकिन अभी भी प्रमुख विदेशी ब्रोकरेज फर्मों को यहां लाना टेढ़ी खीर साबित हो रहा है। फिलहाल, यहां के यूजर्स का 90% हिस्सा सिर्फ भारतीय निवेशकों का है, जो ग्लोबल स्टॉक्स में निवेश कर रहे हैं।
रिपोर्टिंग नियमों का पेच
विदेशी ब्रोकर्स के पीछे हटने का सबसे बड़ा कारण रेगुलेटरी अनुपालन (Regulatory Compliance) है। सिंगापुर और दुबई जैसे सेंटर्स में ब्रोकर्स को पीरियोडिक रिपोर्टिंग की छूट होती है, जबकि GIFT City में हर एक ट्रेड का खुलासा करना अनिवार्य है। हालांकि रेगुलेटर्स का कहना है कि यह 'लिबरलाइज्ड रेमिटेंस स्कीम' की निगरानी और मनी लॉन्ड्रिंग रोकने के लिए जरूरी है, लेकिन ब्रोकर्स इसे बिजनेस की लागत बढ़ाने वाला बोझ मान रहे हैं।
स्ट्रक्चरल बाधाएं और निवेशकों पर असर
इसके अलावा, यहां 'ओम्निबस अकाउंट' स्ट्रक्चर की कमी भी एक बड़ा रोड़ा है। ओम्निबस स्ट्रक्चर के बिना ब्रोकर्स कई क्लाइंट्स के अकाउंट को एक साथ मैनेज नहीं कर पाते, जिससे क्लाइंट की प्राइवेसी और डेटा ट्रांसफर कानूनों का पालन करना मुश्किल हो जाता है। साथ ही, प्राइम ब्रोकिंग सर्विसेज न होने से प्रोफेशनल ट्रेडर्स को भी दिक्कतें आ रही हैं।
इसका सीधा असर भारतीय निवेशकों की पसंद पर पड़ रहा है। कम ब्रोकर्स होने के चलते निवेशकों के पास प्लेटफॉर्म्स के विकल्प सीमित हैं, जिससे ट्रेडिंग की लागत और फीचर्स पर सीधा असर पड़ता है। अब सभी की निगाहें 'इंटरनेशनल फाइनेंशियल सर्विसेज सेंटर्स अथॉरिटी' पर टिकी हैं कि वे नियमों में कितनी लचीलापन लाते हैं ताकि वैश्विक स्तर की कंपनियां यहां अपना विस्तार कर सकें।
