दिग्गज इनवेस्टर Rajeev Thakkar, Prashant Jain और Lakshmi Iyer ने निवेशकों को आगाह किया है कि वे स्मॉल-कैप स्टॉक्स की अंधी दौड़ में शामिल न हों। उन्होंने कहा कि स्टॉक के नाम या लेबल से ज्यादा जरूरी कंपनी के फंडामेंटल्स और उसका कैश फ्लो होता है।
Business Standard BFSI Insight Summit में चर्चा के दौरान बाजार के जानकारों ने मौजूदा मार्केट सेंटीमेंट को लेकर बड़ी चेतावनी दी है। फंड मैनेजर्स का मानना है कि निवेशक आज के दौर में यह देखने के बजाय कि कंपनी का बिजनेस कितना मजबूत है, इस बात पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं कि स्टॉक 'ग्रोथ' है या 'वैल्यू'। विशेषज्ञों के मुताबिक, अस्थिरता से बचने का एकमात्र तरीका कंपनी की असली वैल्यू का पता लगाना है।
इतिहास से सीखें: एंट्री प्राइस है सबसे अहम
पैनल ने बताया कि अगर आप बहुत ज्यादा कीमत पर कोई शेयर खरीदते हैं, तो कंपनी का मुनाफा बढ़ने के बावजूद आपको रिटर्न नहीं मिलेगा। उदाहरण के तौर पर, 2000 से 2008 के बीच Infosys का मुनाफा 7 गुना बढ़ा था, लेकिन उस दौरान शेयर की कीमत एक दायरे में ही रही, क्योंकि शुरुआत में ही निवेशकों ने बहुत ऊंचे दाम पर खरीदारी कर ली थी।
लार्ज-कैप की मजबूती का कोई तोड़ नहीं
फिलहाल निवेशक अपना पैसा लार्ज-कैप से निकालकर मिड-कैप और स्मॉल-कैप में लगा रहे हैं। एक्सपर्ट्स का कहना है कि यह रुख थोड़ा जल्दबाजी भरा हो सकता है। डेटा यह बताता है कि देश की टॉप 100 कंपनियां, कुल 500 लिस्टेड कंपनियों के मुनाफे में 65% से ज्यादा का योगदान देती हैं। लार्ज-कैप कंपनियां बिजनेस सस्टेनेबिलिटी और कैश फ्लो का जो आधार देती हैं, वह छोटी कंपनियों में मिलना मुश्किल होता है।
AI के नाम पर छलावा?
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की बढ़ती लोकप्रियता पर भी जानकारों ने राय दी। उन्होंने साफ किया कि हर टेक कंपनी को एक ही नजरिए से नहीं देखना चाहिए। US की टेक कंपनियां जहां AI का इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार कर रही हैं, वहीं भारतीय कंपनियां फिलहाल इन टूल्स का इस्तेमाल कर रही हैं। निवेशकों को सलाह दी गई है कि सिर्फ AI नाम देखकर पैसा न लगाएं, बल्कि यह देखें कि कंपनी का कैश फ्लो सकारात्मक होने का रास्ता कितना साफ है।
