विदेशी पूंजी से भारतीय फाइनेंस सेक्टर को बूस्ट
भारत के बैंक और फाइनेंसियल फर्म्स (financial firms) विदेशी निवेश में भारी उछाल देख रहे हैं, जो छोटे प्लेयर्स को मजबूती दे रहा है और कॉम्पिटिशन (competition) को तेज कर रहा है। पिछले साल, विदेशी निवेशकों ने करीब ₹12-13 अरब (billion) के सौदों में हिस्सा लिया, जिसमें से $8-9 अरब सीधे कंपनियों की फाइनेंसियल पोजीशन (financial position) को मजबूत करने के लिए आए। यह पूंजी छोटे और मझोले बैंकों को अपनी लेंडिंग पावर (lending power) बढ़ाने और आर्थिक अनिश्चितताओं के बीच भी ग्रोथ (growth) के लिए तैयार होने में मदद कर रही है। अगले 12 से 18 महीनों में छोटे और मझोले बैंकिंग सेक्टर में ऐसे और भी डील (deal) देखने की उम्मीद है।
स्थापित बैंकों के लिए बढ़ता कॉम्पिटिशन
इस पैसे के आने से कॉम्पिटिशन (competition) का माहौल बदल रहा है। ज्यादा कैपिटल (capital) का मतलब है ज्यादा लेंडिंग पावर, जो मौजूदा बैंकों के लिए उपलब्ध प्रॉफिट (profit) को कम कर सकता है। यह वैसी ही स्थिति है जो अफोर्डेबल हाउसिंग फाइनेंस (affordable housing finance) में देखी गई थी, जहां पिछले पांच सालों में कई नई कंपनियों के आने से स्थापित फर्मों के प्रॉफिट (profit) और ग्रोथ (growth) पर दबाव बढ़ा था। ऐसी ही स्थिति व्हीकल (vehicle) और गोल्ड फाइनेंसिंग (gold financing) जैसे क्षेत्रों में भी देखने की आशंका है।
डाइवर्सिफिकेशन: NBFCs के लिए स्थिरता का रास्ता
इस बदलते बाजार में NBFCs के लिए डाइवर्सिफिकेशन (diversification) यानी विभिन्न क्षेत्रों में अपनी सेवाएं फैलाना, स्थिरता पाने का एक अहम रास्ता है। जो कंपनियां अलग-अलग एरिया में सेवाएं देती हैं, वे कम प्रॉफिट मार्जिन (profit margin) को बेहतर तरीके से मैनेज कर सकती हैं और अपनी ग्रोथ (growth) बनाए रख सकती हैं। Bajaj Finance और Cholamandalam Finance इसके प्रमुख उदाहरण हैं, जिन्होंने विभिन्न तरह की सर्विसेज (services) देकर सफलतापूर्वक ग्रोथ की है। कैपिटल जुटाने की योजना बना रहा RBL Bank भी ऐसे निवेश का इस्तेमाल ग्रोथ और रिटर्न (return) बढ़ाने के लिए कर सकता है।