RBI Rate Cuts: विदेशी बैंकों ने दिखाई तेज़ी, भारतीय बैंकों से जल्दी घटाए ब्याज दरें

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AuthorMehul Desai|Published at:
RBI Rate Cuts: विदेशी बैंकों ने दिखाई तेज़ी, भारतीय बैंकों से जल्दी घटाए ब्याज दरें

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के हालिया नीतिगत नरमी के चक्र का असर अब साफ दिखने लगा है। RBI के आंकड़ों से पता चलता है कि फरवरी 2025 से मई 2026 के बीच, विदेशी बैंकों ने अपने भारतीय प्रतिद्वंद्वियों, चाहे वे सरकारी हों या निजी, की तुलना में ब्याज दरों को ज़्यादा तेज़ी से और ज़्यादा घटाया है।

Detailed Coverage

लोन पर दरें घटाने में विदेशी बैंकों का जलवा

RBI के जुलाई 2026 बुलेटिन के मुताबिक, इस अवधि में केंद्रीय बैंक ने रेपो रेट में 125 बेसिस पॉइंट की कटौती की। इसका फायदा ग्राहकों को पहुंचाने में विदेशी बैंकों ने बाज़ी मारी। नए रुपए के लोन के लिए, विदेशी बैंकों ने अपने वेटेड एवरेज लेंडिंग रेट (WALR) में 108 बेसिस पॉइंट की कटौती दर्ज की। वहीं, प्राइवेट सेक्टर के बैंकों ने 81 बेसिस पॉइंट और पब्लिक सेक्टर के बैंकों ने 66 बेसिस पॉइंट की कटौती की। ऐसा इसलिए क्योंकि विदेशी बैंकों का बिजनेस मॉडल बड़े रिटेल नेटवर्क पर कम निर्भर करता है, जिससे उन्हें बाहरी बेंचमार्क के हिसाब से अपनी दरें एडजस्ट करने में ज़्यादा फ्लेक्सिबिलिटी मिलती है।

डिपॉजिट पर भी विदेशी बैंकों की बढ़त

सिर्फ लोन ही नहीं, डिपॉजिट रेट्स घटाने में भी विदेशी बैंकों ने अपनी बढ़त बनाए रखी। उन्होंने फ्रेश डोमेस्टिक टर्म डिपॉजिट पर इंटरेस्ट रेट 91 बेसिस पॉइंट तक कम किए। इसके मुकाबले, प्राइवेट और पब्लिक सेक्टर के बैंकों ने यह दरें क्रमशः 74 और 73 बेसिस पॉइंट घटाईं। पुराने डिपॉजिटर्स के लिए यह अंतर और भी बड़ा था, जहां विदेशी बैंकों ने पॉलिसी ईज़िंग का 90 बेसिस पॉइंट तक का फायदा पहुंचाया, जबकि घरेलू बैंकों में यह 46 से 53 बेसिस पॉइंट के बीच रहा।

EBLR का असर

RBI का कहना है कि इस तेज़ ट्रांसमिशन की एक बड़ी वजह एक्सटर्नल बेंचमार्क-लिंक्ड लेंडिंग रेट्स (EBLRs) का व्यापक रूप से अपनाया जाना है। ये लोंस सीधे रेपो रेट के साथ चलते हैं, जिससे बैंकों को कटौती का फायदा तुरंत ग्राहकों तक पहुंचाना पड़ता है। हालांकि, इसका मतलब यह भी है कि भविष्य में जब रेट्स बढ़ेंगे, तो इन बरोअर्स को तेज़ी से बढ़ी हुई EMI का सामना करना पड़ेगा।

सेक्टर-वाइज लोन ट्रेंड्स

यह भी ध्यान देने वाली बात है कि सभी तरह के लोंस पर रेट कट का असर एक जैसा नहीं रहा। इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़े लोंस पर इंटरेस्ट कॉस्ट में सबसे ज़्यादा 123 बेसिस पॉइंट की कमी आई, क्योंकि ये अक्सर एक्सटर्नल बेंचमार्क से जुड़े होते हैं। इसके बाद एजुकेशन और व्हीकल लोंस में 118 बेसिस पॉइंट की कटौती देखी गई। वहीं, एग्रीकल्चर और ट्रेड जैसे सेक्टर्स में दरें अपेक्षाकृत कम घटीं, जिसका कारण पुराने लोन कॉन्ट्रैक्ट्स का ज़्यादा होना हो सकता है जो मौजूदा एक्सटर्नल बेंचमार्क से लिंक नहीं हैं। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि घरेलू बैंक अपने पुराने लोन पोर्टफोलियो को इन नए, पारदर्शी बेंचमार्क-लिंक्ड स्ट्रक्चर में कैसे बदलते हैं और अपने मार्जिन्स को कैसे मैनेज करते हैं।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.