भारतीय बाज़ार में काम कर रहे विदेशी बैंकों ने हाल ही में हुई रेपो रेट कटौती का फायदा अपने ग्राहकों तक पहुँचाने में सरकारी और प्राइवेट बैंकों से ज़्यादा तेज़ी दिखाई है। उन्होंने लोन और डिपॉजिट, दोनों पर ब्याज दरें तेज़ी से कम की हैं।
Detailed Coverage
लोन की दरों में बड़ी राहत
जब भी भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) अपनी रेपो रेट में कटौती करता है, तो इसका मकसद पूरे इकोनॉमी में कर्ज़ लेने की लागत को कम करना होता है। फरवरी 2025 से मई 2026 तक के डेटा के मुताबिक, विदेशी बैंकों ने नए रुपए के लोन पर वेटेड एवरेज लेंडिंग रेट (WALR) में 1.24% की कमी की। वहीं, प्राइवेट सेक्टर के बैंकों ने 1.08% और सरकारी बैंकों ने महज़ 0.66% की कटौती की।
यह कमी पहले से चल रहे लोन पर भी दिखी। विदेशी बैंकों ने इन पर 1.20% दरें घटाईं, जबकि प्राइवेट बैंकों ने 0.98% और सरकारी बैंकों ने 0.81% की कटौती की। इसका सीधा मतलब है कि विदेशी बैंकों से लोन लेने वाले ग्राहकों की EMI पर असर जल्दी पड़ा।
डिपॉजिट पर भी विदेशी बैंकों का जलवा
सेविंग्स की बात करें तो यहाँ भी विदेशी बैंकों ने बाज़ी मारी। फ्रेश डिपॉजिट पर वेटेड एवरेज डोमेस्टिक टर्म डिपॉजिट रेट में विदेशी बैंकों ने 0.91% की कटौती की। प्राइवेट और सरकारी बैंकों ने क्रमशः 0.74% और 0.73% की कटौती की, जो कि विदेशी बैंकों से काफी कम है। आउटस्टैंडिंग डिपॉजिट पर यह अंतर और भी बड़ा था, जहाँ विदेशी बैंकों ने 0.90% की कटौती की, वहीं प्राइवेट बैंकों ने 0.46% और सरकारी बैंकों ने 0.53% की।
दरों में अंतर की वजह
विदेशी बैंकों के लिए फंड जुटाने का तरीका और लॉन्ग-टर्म रिटेल डिपॉजिट पर उनकी निर्भरता, बड़े सरकारी बैंकों से थोड़ी अलग होती है। उनके बिजनेस मॉडल और लिक्विडिटी मैनेजमेंट की स्ट्रेटेजी उन्हें RBI के संकेतों पर तेज़ी से प्रतिक्रिया देने में मदद करती है। इसके विपरीत, सरकारी बैंकों के पास छोटे रिटेल ग्राहकों की बड़ी और स्थिर डिपॉजिट बेस होता है, जिससे उन्हें डिपॉजिट रेट्स एडजस्ट करने में समय लगता है। इसी वजह से, प्रॉफिट मार्जिन को बनाए रखने के लिए वे लोन की दरें भी धीरे-धीरे कम कर पाते हैं।
RBI ने फरवरी 2025 से कुल 1.25% रेपो रेट कटौती की है। अब देखना यह होगा कि क्या आने वाले समय में भारतीय बैंक इस अंतर को कम कर पाते हैं या विदेशी बैंक अपनी इस तेज़ी को बनाए रखते हैं।
