भारत में काम कर रहे विदेशी बैंकों ने RBI की खास डॉलर-रुपया स्वैप विंडो का फायदा उठाते हुए FCNR (Foreign Currency Non-Resident) डिपॉजिट्स में जबरदस्त बढ़ोतरी की है। 30 जुलाई तक ये डिपॉजिट्स बढ़कर $8.97 अरब हो गए हैं, जो 5 जून को शुरू हुई इस स्कीम के बाद से एक बड़ी उछाल है।
RBI की स्वैप विंडो का कमाल
रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) ने भारतीय रुपये को सहारा देने और देश में विदेशी मुद्रा लाने के लिए 5 जून को एक खास डॉलर-रुपया स्वैप विंडो खोली थी। इस स्कीम के तहत, RBI करेंसी के उतार-चढ़ाव का जोखिम (hedging risk) खुद उठाता है। इसी वजह से बैंक, नॉन-रेजिडेंट इंडियंस (NRIs) को आकर्षक ब्याज दरें दे पा रहे हैं।
विदेशी बैंकों की चांदी
विदेशी बैंकों ने अपनी ग्लोबल पहुंच का खूब फायदा उठाया है। जहां कई घरेलू बैंकों को डॉलर जुटाने में मशक्कत करनी पड़ती है, वहीं विदेशी बैंक आसानी से अपनी मौजूदा ग्लोबल फंडिंग लाइन्स का इस्तेमाल कर रहे हैं। HSBC इस मामले में सबसे आगे है, जिसने जुलाई के अंत तक करीब $6.14 अरब जुटाए हैं। इसके बाद Standard Chartered और DBS Bank India का नंबर आता है। 30 जुलाई 2026 तक, इन बैंकों के FCNR डिपॉजिट्स बढ़कर $8.97 अरब हो गए, जो 5 जून के $603 मिलियन के मुकाबले एक बड़ी छलांग है।
हाई-लिवरेज का जोखिम
जहां यह डॉलर इनफ्लो भारत के फॉरेक्स रिजर्व के लिए अच्छा है, वहीं कुछ विदेशी बैंक जिस तरह से रिटर्न बढ़ाने के लिए 19 गुना तक हाई लिवरेज का इस्तेमाल कर रहे हैं, उस पर निवेशकों को नजर रखनी चाहिए। यह लिवरेज लोकल बैंकों के मुकाबले काफी ज्यादा है।
निवेशकों के लिए यह एक जोखिम भरा कदम हो सकता है। अगर ये डिपॉजिट्स स्थिर, लॉन्ग-टर्म एसेट्स से मैच नहीं करते या बाजार में अचानक कोई बदलाव आता है, तो लिक्विडिटी का दबाव बन सकता है। साथ ही, 30 सितंबर 2026 को RBI की स्वैप विंडो बंद होने के बाद क्या होगा, यह भी एक बड़ा सवाल है।
यह देखना अहम होगा कि स्वैप विंडो खत्म होने के बाद बैंक इन डिपॉजिट्स को बनाए रख पाते हैं या नहीं। अगर ये फंड्स वापस चले जाते हैं या बैंकों को इन्हें महंगी फंडिंग से बदलना पड़ता है, तो उनके प्रॉफिट मार्जिन पर असर पड़ सकता है। यह इनफ्लो विदेशी बैंकों की ऑपरेशनल एफिशिएंसी को दिखाता है, लेकिन भविष्य में इनकी स्थिरता शेयरधारकों के लिए सबसे महत्वपूर्ण फैक्टर बनी रहेगी।
