RBI Data: विदेशी बैंकों ने घटाई ब्याज दरें, भारतीय बैंकों से तेज एक्शन

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AuthorAditya Rao|Published at:
RBI Data: विदेशी बैंकों ने घटाई ब्याज दरें, भारतीय बैंकों से तेज एक्शन

भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) के ताज़ा आंकड़ों के अनुसार, भारत में काम कर रहे विदेशी बैंकों ने अपनी ब्याज दरों में कटौती का फायदा ग्राहकों और जमाकर्ताओं तक भारतीय बैंकों की तुलना में तेज़ी से पहुंचाया है। आंकड़ों से पता चलता है कि विदेशी बैंकों ने जहां नए लोन पर अपनी ब्याज दरें **1.24%** तक घटा दीं, वहीं सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने इसे केवल **0.66%** तक ही कम किया।

Detailed Coverage

क्या कहते हैं RBI के आंकड़े?

भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) के ताज़ा बुलेटिन में यह बात सामने आई है कि भारत में विदेशी बैंकों ने पॉलिसी रेट्स में कटौती का फायदा अपने ग्राहकों तक तेज़ी से पहुंचाया है। ब्याज दर ट्रांसमिशन (Interest Rate Transmission) का मतलब है कि सेंट्रल बैंक के रेपो रेट में बदलाव का असर बैंकों द्वारा ग्राहकों से लिए जाने वाले लोन और जमा पर मिलने वाले ब्याज पर कितना और कितनी जल्दी पड़ता है।

लोन और जमा पर दरें

फरवरी 2025 से मई 2026 के बीच, विदेशी बैंकों ने नए रुपया लोन (Rupee Loans) पर अपनी वेटेड एवरेज लेंडिंग रेट (Weighted Average Lending Rate) को 1.24% अंक तक कम किया। इसकी तुलना में, प्राइवेट सेक्टर के बैंकों ने दरों में 1.08% अंक की कटौती की, जबकि सरकारी बैंकों यानी पब्लिक सेक्टर बैंकों (Public Sector Banks) ने यह कटौती महज़ 0.66% अंक की। इसका सीधा मतलब यह है कि विदेशी बैंकों से लोन लेने वाले ग्राहकों की ईएमआई (EMI) पर राहत सरकारी बैंकों के ग्राहकों की तुलना में जल्दी आई होगी।

यही हाल जमाकर्ताओं (Depositors) का भी रहा। विदेशी बैंकों ने फ्रेश डिपॉजिट्स पर अपनी वेटेड एवरेज डोमेस्टिक टर्म डिपॉजिट रेट (Weighted Average Domestic Term Deposit Rate) 0.91% अंक घटाई। वहीं, प्राइवेट और सरकारी बैंकों ने इसमें क्रमशः 0.74% और 0.73% अंक की मामूली कटौती की। पुरानी जमाओं (Outstanding Deposits) के मामले में यह अंतर और भी बड़ा रहा, जहाँ विदेशी बैंकों ने 0.90% अंक की कटौती की, जबकि घरेलू बैंकों ने इससे काफी कम कटौती की।

ट्रांसमिशन की गति में अंतर क्यों?

सरकारी बैंकों के पास अक्सर पुरानी फिक्स्ड-रेट वाली लोन की बड़ी हिस्सेदारी होती है और उनकी डिपॉजिट संरचना भी अलग होती है। इस वजह से, रेपो रेट में बदलाव के जवाब में अपनी लेंडिंग और डिपॉजिट दरों को समायोजित करने में उन्हें अधिक समय लग सकता है। दूसरी ओर, विदेशी बैंक, जिनका फोकस अक्सर बड़े कॉर्पोरेट क्लाइंट्स पर होता है, वे अपनी कीमतों को ज़्यादा तेज़ी से बदल सकते हैं ताकि बाज़ार में प्रतिस्पर्धी बने रहें और अपनी लिक्विडिटी (Liquidity) को मैनेज कर सकें।

2025 की शुरुआत से, RBI ने अर्थव्यवस्था को सहारा देने के लिए रेपो रेट में कुल 1.25% अंक की कटौती की है। हालांकि सेंट्रल बैंक को उम्मीद है कि ये दरें जल्द ही सभी क्षेत्रों तक पहुंचेंगी, लेकिन इसकी गति बैंक के फंड की लागत, उनके लोन पोर्टफोलियो की प्रकृति और उनके प्रॉफिट मार्जिन (Profit Margin) को सुरक्षित रखने की इच्छा पर निर्भर करती है। बैंकिंग सेक्टर पर नज़र रखने वाले निवेशक इन ट्रांसमिशन स्पीड पर गौर कर सकते हैं, क्योंकि यह नेट इंटरेस्ट मार्जिन (Net Interest Margin) को प्रभावित करता है।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.