Market Volatility: शेयर बाजार की गिरावट के बीच सुरक्षित निवेश की होड़, FD और बॉन्ड्स बने निवेशकों की पसंद

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AuthorKaran Malhotra|Published at:
Market Volatility: शेयर बाजार की गिरावट के बीच सुरक्षित निवेश की होड़, FD और बॉन्ड्स बने निवेशकों की पसंद

बाजार में भारी उथल-पुथल के बीच निवेशक अब सुरक्षित रास्तों की तलाश कर रहे हैं। Nifty 50 में **6.06%** की गिरावट और FPI द्वारा **₹44,166 करोड़** की निकासी के बाद, अब फिक्स्ड-इनकम एसेट्स यानी फिक्स्ड डिपॉजिट और कॉर्पोरेट बॉन्ड्स की ओर रुझान बढ़ा है। RBI द्वारा रेपो रेट को **5.50%** करने के बाद से डेट मार्केट में हलचल तेज है।

भारतीय शेयर बाजार में पिछले कुछ हफ्तों से भारी दबाव बना हुआ है, जिसने निवेशकों को अपनी पोर्टफोलियो रणनीति बदलने पर मजबूर कर दिया है। सितंबर का महीना बेहद चुनौतीपूर्ण रहा, जिसमें Nifty 50 इंडेक्स में 6.06% की बड़ी गिरावट दर्ज की गई। भू-राजनीतिक अनिश्चितता और $100 प्रति बैरल के पार जाते कच्चे तेल की कीमतों ने बाजार के मूड को खराब कर रखा है।

बाजार का मूड और सुरक्षित निवेश की ओर कदम

इस अनिश्चितता का असर आंकड़ों में साफ दिख रहा है। विदेशी निवेशकों (FPIs) ने अक्टूबर के शुरुआती 11 दिनों में भारतीय बाजार से ₹44,166 करोड़ की बड़ी रकम निकाली है। बाजार की इस अस्थिरता को देखते हुए, अब पूंजी सुरक्षित निवेश के साधनों की ओर रुख कर रही है।

रेपो रेट बढ़ने का असर

RBI ने हाल ही में रेपो रेट को 25 बेसिस पॉइंट्स बढ़ाकर 5.50% कर दिया है। जैसे-जैसे ब्याज दरें बढ़ती हैं, डेट इंस्ट्रूमेंट्स का आकर्षण बढ़ जाता है। हालांकि, यहां चुनाव करना आसान नहीं है। एक तरफ बैंक फिक्स्ड डिपॉजिट की सुरक्षा है, तो दूसरी तरफ कॉर्पोरेट बॉन्ड्स के आकर्षक लेकिन जोखिम भरे रिटर्न।

रिस्क-रिवॉर्ड का गणित

जो निवेशक अपनी पूंजी को पूरी तरह सुरक्षित रखना चाहते हैं, उनके लिए बैंक फिक्स्ड डिपॉजिट अभी भी पहली पसंद हैं। DICGC के जरिए प्रति बैंक प्रति जमाकर्ता ₹5 लाख तक की इंश्योरेंस सुरक्षा मिलती है, जो इसे सुरक्षित बनाती है।

दूसरी ओर, कॉर्पोरेट बॉन्ड्स 9% से 15% तक का रिटर्न ऑफर करते हैं। लेकिन ध्यान रहे, यहाँ 'क्रेडिट रिस्क' होता है—यानी कंपनी का डिफॉल्ट करना। इसलिए सिर्फ रिटर्न देखकर निवेश न करें, बल्कि कंपनी की फाइनेंशियल हेल्थ और कैश फ्लो को जरूर परखें।

पोर्टफोलियो में सावधानी

बढ़ती ब्याज दरों के माहौल में 'इंटरेस्ट रेट रिस्क' को समझना जरूरी है। जब दरें बढ़ती हैं, तो पुराने बॉन्ड्स की वैल्यू कम हो जाती है। लंबी अवधि के बॉन्ड्स में पैसा फंसाने से पहले अपनी लिक्विडिटी जरूरतों का आकलन जरूर करें। क्रेडिट रेटिंग्स को सिर्फ एक आधार मानें, अंतिम फैसला हमेशा अपनी वित्तीय स्थिति को देखकर ही लें।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.