Raise Financial Services के CEO, प्रवीण जाधव, जिनका फर्म $1.2 बिलियन की वैल्यूएशन पर है, हाल ही में एक बड़े प्राइवेट बैंक से होम लोन लेने गए थे, लेकिन उनका लोन रिजेक्ट हो गया। यह घटना भारत में पारंपरिक बैंकिंग मॉडल की कमियों को उजागर करती है, जो स्टार्टअप फाउंडर्स की अस्थिर आय के बजाय फिक्स्ड सैलरी को प्राथमिकता देते हैं।
Raise Financial Services के फाउंडर और CEO, प्रवीण जाधव, का होम लोन रिजेक्ट होना भारतीय बैंकों के क्रेडिट असेसमेंट (Credit Assessment) के तरीके पर एक बड़ी बहस छेड़ रहा है। $1.2 बिलियन की वैल्यूएशन वाली कंपनी के प्रमुख और लगभग 800 के बेहतरीन CIBIL स्कोर के बावजूद, जाधव का होम लोन एक प्रमुख प्राइवेट बैंक ने खारिज कर दिया। जाधव ने बताया कि वे खुद उस बैंक के 25 साल से भी पुराने ग्राहक हैं और उनके पास वहां पर्याप्त संपत्ति भी है, जो लोन की राशि से कहीं ज़्यादा है।
इस पूरी समस्या की जड़ बैंकिंग संस्थानों द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले लोन देने के मापदंड हैं। ज़्यादातर बैंक ऐसे स्टैण्डर्ड असेसमेंट मॉडल पर भरोसा करते हैं जो हर महीने मिलने वाली फिक्स्ड सैलरी वाले लोगों को प्राथमिकता देते हैं। इसके उलट, एक स्टार्टअप फाउंडर की आय अक्सर परफॉरमेंस-बेस्ड कमीशन, डिविडेंड या फिर कंपनी में वापस री-इन्वेस्ट होने वाली कमाई के रूप में होती है, जो रेगुलर नहीं होती। ऐसे में, भले ही फाउंडर के पास अच्छी-खासी नेट वर्थ (Net Worth) और क्रेडिट हिस्ट्री हो, लेकिन उनकी आय सैलरी के पारंपरिक ढांचे में फिट नहीं बैठती, इसलिए बैंक उन्हें ज़्यादा जोखिम वाला उधारकर्ता मान लेते हैं।
यह क्रेडिट असेसमेंट गैप भारतीय बैंकिंग सेक्टर की एक बड़ी संरचनात्मक चुनौती को दर्शाता है। भारत में जहाँ एंटरप्रेन्योरशिप (Entrepreneurship) और स्टार्टअप इकोसिस्टम तेजी से बढ़ रहा है, वहीं रिटेल क्रेडिट के लिए बैंकों की प्रक्रियाएँ काफी पीछे छूट गई हैं। फिक्स्ड इनकम के बेंचमार्क पर टिके रहने से ऐसे हाई-नेट-वर्थ वाले उद्यमी भी पीछे रह जाते हैं जो आर्थिक रूप से काफी मजबूत होते हैं। कई फाउंडर्स के लिए, यह एक तरह से उनके प्रोफेशनल स्टेटस के कारण उनके पर्सनल क्रेडिट प्रोफाइल पर पड़ने वाला नकारात्मक असर है, भले ही उनकी कंपनी कितनी भी सफल क्यों न हो।
निवेशकों के नजरिए से, यह घटना बैंकों की जोखिम मूल्यांकन (Risk Evaluation) रणनीतियों को आधुनिक बनाने की ज़रूरत पर ज़ोर देती है, ताकि वे आज के प्रोफेशनल्स की बदलती वित्तीय हकीकत को समझ सकें। जैसे-जैसे भारत का स्टार्टअप इकोसिस्टम परिपक्व हो रहा है, बैंकों की 'एंटरप्रेन्योरियल रिस्क' और असल डिफॉल्ट रिस्क के बीच अंतर करने की क्षमता एक महत्वपूर्ण कॉम्पिटिटिव एज (Competitive Edge) बन सकती है। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या बड़े प्राइवेट लेंडर्स नॉन-सैलरीड हाई-नेट-वर्थ इंडिविजुअल्स की क्रेडिट-वर्दीनेस का सटीक आकलन करने के लिए ज़्यादा फ्लेक्सिबल, कैश-फ्लो-बेस्ड अंडरराइटिंग मॉडल पेश करते हैं।
