PwC इंडिया और Dvara रिसर्च की एक ज्वाइंट स्टडी में कहा गया है कि भारत का फोकस अब बेसिक अकाउंट एक्सेस (Bank Account Access) से हटकर परिवारों की फाइनेंशियल हेल्थ (Financial Health) को बेहतर बनाने पर होना चाहिए। रिपोर्ट बताती है कि डोर्मेंट अकाउंट्स (Dormant Accounts) और माइक्रोफाइनेंस (Microfinance) पर बढ़ता दबाव इस बात का सबूत है कि सिर्फ पहुंच ही लोगों को मजबूत नहीं बना सकती।
भारत ने लाखों लोगों को फॉर्मल फाइनेंशियल सिस्टम (Formal Financial System) से जोड़ने में बड़ी सफलता हासिल की है, खासकर अकाउंट ओनरशिप (Account Ownership) के मामले में। लेकिन, PwC इंडिया और Dvara रिसर्च की एक नई रिपोर्ट के मुताबिक, अगले चरण में एक बड़े बदलाव की ज़रूरत है। पिछले एक दशक में जहां बैंकिंग सेवाओं की पहुंच बढ़ाने पर जोर रहा, वहीं यह रिसर्च कहती है कि बैंक अकाउंट का होना अपने आप में फाइनेंशियल वेल-बीइंग (Financial Well-being) नहीं है। अब इन्वेस्टर्स (Investors) और पॉलिसीमेकर्स (Policymakers) से कहा जा रहा है कि वे सिर्फ अकाउंट खोलने के आंकड़ों से आगे बढ़कर परिवारों की असल फाइनेंशियल रेजिलिएंस (Financial Resilience) का मूल्यांकन करें।
एक्सेस (Access) और यूसेज (Usage) के बीच का अंतर
स्टडी में उठाई गई एक बड़ी चिंता डोर्मेंट अकाउंट्स (Dormant Accounts) की भारी संख्या है। भले ही देश की आबादी के पास बड़ी संख्या में बैंक अकाउंट हों, लेकिन ये अक्सर इनएक्टिव (Inactive) रहते हैं। शोधकर्ताओं का कहना है कि अकाउंट्स का इनएक्टिव रहना, और साथ ही माइक्रोफाइनेंस सेक्टर (Microfinance Sector) में लगातार बढ़ती रिपेमेंट प्रेशर (Repayment Pressure), इस बात का पुख्ता सबूत है कि फॉर्मल प्रोडक्ट्स (Formal Products) तक पहुंच मिलना लोगों के लिए बेहतर फाइनेंशियल आउटकम (Financial Outcomes) सुनिश्चित नहीं करता।
माइक्रोफाइनेंस और इनकम स्टेबिलिटी की चुनौतियां
रिपोर्ट के अनुसार, इनकम की अस्थिरता (Income Volatility) एक बड़ा बैरियर है जो परिवारों को लगातार सेविंग्स (Savings) बनाए रखने या लोन की ईएमआई (EMI) समय पर चुकाने से रोकता है। चूंकि फॉर्मल फाइनेंशियल प्रोडक्ट्स (Formal Financial Products) में अक्सर रिजिड स्ट्रक्चर्स (Rigid Structures) होते हैं, वे कई परिवारों के अनियमित कैश-फ्लो पैटर्न (Irregular Cash-flow Patterns) के साथ ठीक से मेल नहीं खा पाते। रिसर्च बताती है कि कुछ मामलों में, कम्युनिटी लेंडर्स (Community Lenders) और सेल्फ-हेल्प ग्रुप्स (Self-help Groups) जैसे इनफॉर्मल चैनल (Informal Channels) ज्यादा फ्लेक्सिबल सपोर्ट (Flexible Support) देने में सक्षम रहे हैं। यह सुझाव देता है कि इन्हें फॉर्मल बैंकिंग संस्थानों का कॉम्पिटिटर (Competitor) समझने के बजाय कॉम्प्लिमेंट्री (Complementary) के तौर पर देखा जाना चाहिए।
फाइनेंशियल सक्सेस को नए सिरे से मापना
स्टडी यह सिफारिश करती है कि फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशन्स (Financial Institutions) और पॉलिसीमेकर्स (Policymakers) को सफलता मापने के तरीके बदलने चाहिए। सिर्फ नए खोले गए अकाउंट्स की संख्या को ट्रैक करने के बजाय, फोकस इस बात पर होना चाहिए कि परिवार अचानक आने वाले फाइनेंशियल शॉक (Financial Shocks) को कैसे झेल पाते हैं। फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशन्स के लिए, इसका मतलब हो सकता है कि वे ऐसे प्रोडक्ट डिजाइन्स (Product Designs) विकसित करें जो अनियमित रिपेमेंट शेड्यूल (Irregular Repayment Schedules) की अनुमति दें और ऐसे सेविंग ऑप्शंस (Savings Options) तैयार करें जो ग्राहकों के असल इनकम पैटर्न (Income Patterns) के अनुरूप हों।
फाइनेंशियल सेक्टर (Financial Sector) के लिए, फाइनेंशियल हेल्थ (Financial Health) मापने की ओर यह बदलाव भविष्य के प्रोडक्ट डेवलपमेंट (Product Development) और सर्विस डिलीवरी (Service Delivery) को प्रभावित कर सकता है। इन्वेस्टर्स (Investors) इस बात पर नजर रख सकते हैं कि बैंक और फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशन्स, सिर्फ अकाउंट्स की संख्या बढ़ाने के बजाय, कस्टमर एंगेजमेंट मेट्रिक्स (Customer Engagement Metrics) जैसे एक्टिव यूसेज रेट्स (Active Usage Rates) और अपने लोन पोर्टफोलियो (Loan Portfolios) की क्वालिटी को प्राथमिकता देना शुरू करते हैं या नहीं। शोधकर्ताओं द्वारा प्रस्तावित अंतिम लक्ष्य एक ऐसी प्रणाली बनाना है जहां फॉर्मल फाइनेंस (Formal Finance) भारतीय परिवारों की दीर्घकालिक आर्थिक स्थिरता (Long-term Economic Stability) में सक्रिय रूप से योगदान दे।
