देश के वित्त मंत्रियों ने बैंकों से लोन देने के तरीके में बड़ा बदलाव करने की मांग की है। अब बैंकों से कहा गया है कि वे सिर्फ गिरवी (Collateral) पर निर्भर न रहें, बल्कि भविष्य में होने वाली कमाई (Cash-flow) को आधार बनाकर कर्ज दें।
SBI बैंकिंग एंड इकोनॉमिक्स कॉन्क्लेव 2026 में महाराष्ट्र, असम, उत्तर प्रदेश और आंध्र प्रदेश के वित्त मंत्रियों ने बैंकिंग सिस्टम में बदलाव का पुरजोर समर्थन किया है। अभी तक भारतीय बैंक मुख्य रूप से जमीन या मशीनों जैसे फिजिकल एसेट्स को गिरवी रखकर लोन देते हैं, लेकिन अब इसे बदलने की जरूरत महसूस की जा रही है।
यह बदलाव क्यों है जरूरी?
आज के दौर की कई नई कंपनियां जैसे ग्रीन एनर्जी, मैन्युफैक्चरिंग और लॉजिस्टिक्स सेक्टर के पास भविष्य की बड़ी संभावनाएं हैं, लेकिन उनके पास गिरवी रखने के लिए बड़ी फिजिकल प्रॉपर्टीज नहीं होतीं। कैश-फ्लो बेस्ड लेंडिंग से इन स्टार्टअप्स और नए उद्योगों को आसानी से पूंजी मिल सकेगी, क्योंकि बैंक उनकी कमाई करने की क्षमता के आधार पर रिस्क का आकलन करेंगे।
राज्यों की बढ़ती सक्रियता
राज्यों की नीतियां भी इस बदलाव को सपोर्ट कर रही हैं। उदाहरण के लिए, असम में लॉजिस्टिक्स और फूड प्रोसेसिंग पर जोर दिया जा रहा है, जहाँ हाल ही में ₹778 करोड़ का PepsiCo का प्लांट लगा है। वहीं, उत्तर प्रदेश सरकार ने इस फाइनेंशियल ईयर में उद्योगों को करीब ₹17,000 करोड़ के इंसेंटिव दिए हैं, जिससे औद्योगिक गतिविधियों में तेजी आई है।
निवेशकों के लिए चेतावनी और Monitorables
यह मॉडल जितना आकर्षक है, बैंकों के लिए उतना ही चुनौतीपूर्ण भी। फिजिकल कोलैटरल न होने पर बैंकों के लिए रिस्क बढ़ जाता है। अगर बैंक बिना सही रिस्क मैनेजमेंट के लोन बांटेंगे, तो मंदी के समय बैड लोन (Bad Loans) का आंकड़ा बढ़ सकता है।
निवेशकों को अब तिमाही नतीजों में यह देखना होगा कि बैंक अपने लोन पोर्टफोलियो में कोलैटरल वाले और बिना कोलैटरल वाले कर्ज का बैलेंस कैसे बना रहे हैं। आने वाली तिमाहियों में बैंक अपनी क्रेडिट असेसमेंट फ्रेमवर्क में क्या बदलाव करते हैं, यही शेयर की चाल तय करेगा।
