विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) ने अगस्त में भारतीय शेयर बाज़ार में ₹23,544 करोड़ का निवेश किया है। यह लगातार दूसरे महीने हुए इनफ्लो का संकेत है। हालांकि, यह राहत की बात है, पर विदेशी फंड्स अभी भी काफी चुनिंदा बने हुए हैं और वे किसी खास सेक्टर जैसे फाइनेंशियल सर्विसेज पर फोकस कर रहे हैं, न कि भारत में बड़े, लॉन्ग-टर्म दांव लगा रहे हैं।
अगस्त में FPIs ने फिर बाज़ार का भरोसा जीता!
अगस्त 2026 में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) ने भारतीय शेयर बाज़ार में पूंजी डालना जारी रखा है, जो लगातार दूसरे महीने की खरीदारी का संकेत है। आंकड़े बताते हैं कि अगस्त (23 अगस्त तक) में विदेशी निवेशकों ने भारतीय इक्विटीज़ में ₹23,544 करोड़ का निवेश किया, जबकि जुलाई में यह ₹20,200 करोड़ था। इस साल की शुरुआत में, खासकर मार्च 2026 में हुए रिकॉर्ड ₹1.17 लाख करोड़ के आउटफ्लो के बाद, यह पैटर्न बाज़ार के लिए बड़ी राहत लेकर आया है।
चुनिंदा सेक्टर में निवेश, ब्रॉड सेंटिमेंट नहीं
हालांकि, यह इनफ्लो वैश्विक फंड्स के सेंटिमेंट में बड़े बदलाव का संकेत नहीं है। इसके बजाय, विदेशी निवेशक बहुत सेलेक्टिव (चुनिंदा) हो रहे हैं और उन सेक्टर्स को टारगेट कर रहे हैं, जहाँ हालिया प्राइस करेक्शन के बाद वैल्यूएशन (मूल्यांकन) अधिक आकर्षक हो गए हैं। डेटा के अनुसार, इस नई पूंजी का एक बड़ा हिस्सा फाइनेंशियल सर्विसेज और ऑटोमोबाइल सेक्टर में जा रहा है। यह उनके हालिया व्यवहार से बिल्कुल अलग है, जहाँ वे टेलीकॉम, रियल एस्टेट और कैपिटल गुड्स जैसे सेक्टर्स में सक्रिय रूप से बिकवाली कर रहे थे।
साल 2026 में नेट सेलर, पर शॉर्ट-टर्म दांव!
हालिया खरीदारी के बावजूद, विदेशी निवेशक साल 2026 में नेट सेलर (शुद्ध विक्रेता) बने हुए हैं, और अब तक कुल निकासी ₹2.3 लाख करोड़ से अधिक हो चुकी है। बैंक ऑफ अमेरिका के एक हालिया फंड मैनेजर सर्वे से यह सतर्क रवैया उजागर होता है, जिसमें 32% उत्तरदाताओं का मानना है कि भारत एशिया का सबसे कम पसंदीदा बाज़ार है। यह बताता है कि पूंजी की यह वापसी कुछ खास क्षेत्रों में वैल्यू (मूल्य) उठाने का एक टैक्टिकल (सामरिक) कदम है, न कि भारत की तत्काल ग्रोथ स्टोरी में व्यापक विश्वास का संकेत।
इनफ्लो को सपोर्ट करने वाले फैक्टर्स
इस चुनिंदा रुचि को कई कारक सहारा दे रहे हैं। स्थिर करेंसी मूवमेंट और एक ठीक-ठाक जून-तिमाही के अर्निंग्स (कमाई) सीजन ने एक कुशन (सहारा) प्रदान किया है। इसके अलावा, कुछ वैश्विक निवेशक अमेरिका में संभावित ब्याज दर में कटौती की उम्मीद में अपने पोर्टफोलियो को एडजस्ट कर रहे हैं, जो अक्सर इमर्जिंग मार्केट्स में फ्लो को प्रोत्साहित करता है। भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) द्वारा रुपये को स्थिर रखने के प्रयासों ने भी विदेशी निवेशकों के लिए करेंसी लॉस (मुद्रा हानि) के जोखिम को कम करने में मदद की है।
संभावित जोखिम और आगे की राह
हालांकि, जोखिम बने हुए हैं। बाज़ार अभी भी वैश्विक भू-राजनीतिक तनावों, तेल की कीमतों और अमेरिकी ब्याज दर की उम्मीदों में बदलाव के प्रति संवेदनशील है। चूंकि वर्तमान इनफ्लो विशिष्ट वैल्यू-ड्रिवन सेगमेंट्स पर केंद्रित है, बाज़ार के सेंटिमेंट में कोई बदलाव या इन सेक्टर्स में वैल्यूएशन में अचानक वृद्धि से तेज़ रिवर्सल (पलटाव) हो सकता है। निवेशकों के लिए, आने वाले महीनों में मुख्य निगरानी यह होगी कि क्या यह चुनिंदा खरीदारी की प्रवृत्ति बनी रहती है या व्यापक वैश्विक अस्थिरता FPIs के व्यवहार को प्रभावित करती रहती है।
