FPI Debt Inflows: भारतीय बॉन्ड में विदेशी पैसा ‘सुनामी’ की तरह! 15 महीने का रिकॉर्ड टूटा

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AuthorSaanvi Reddy|Published at:
FPI Debt Inflows: भारतीय बॉन्ड में विदेशी पैसा ‘सुनामी’ की तरह! 15 महीने का रिकॉर्ड टूटा

जून 2026 में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) ने भारतीय सरकारी बॉन्ड में **$2.2 बिलियन** का निवेश किया है, जो पिछले 15 महीनों में सबसे बड़ा आंकड़ा है। हाल ही में हुए टैक्स नियमों में बदलाव और लंबी अवधि के बॉन्ड में निवेश की इजाजत मिलने से यह तेज़ी आई है।

क्या हुआ?

जून 2026 में, विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) ने भारतीय बॉन्ड मार्केट में अपनी भागीदारी काफी बढ़ा दी है। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, FPIs ने 25 जून तक फुली एक्सेसिबल रूट (FAR) के जरिए भारतीय सरकारी सिक्योरिटीज (G-Secs) में लगभग $2.2 बिलियन का निवेश किया। यह पिछले 15 महीनों में सबसे ज़्यादा मासिक इनफ्लो है। पिछले महीने, मई में यह आंकड़ा केवल $0.46 बिलियन था। इस साल 2026 में FAR के जरिए कुल FPI इनफ्लो $3.81 बिलियन तक पहुंच गया है, जिसमें से अकेले जून में आधे से ज़्यादा का योगदान रहा।

पॉलिसी नियमों में बदलाव

खरीदारी में इस अचानक तेज़ी का सीधा संबंध 5 जून को सरकार द्वारा की गई पॉलिसी घोषणाओं से है। इन बदलावों का मकसद अंतर्राष्ट्रीय निवेशकों के लिए भारतीय बॉन्ड को खरीदना और रखना आसान और ज़्यादा फायदेमंद बनाना था। खासतौर पर, सरकार ने G-Secs में FPI निवेश पर ब्याज और कैपिटल गेन पर टैक्स छूट दी है, जो 1 अप्रैल 2026 से लागू मानी जाएगी। इसके अलावा, अथॉरिटीज ने फुली एक्सेसिबल रूट के तहत उपलब्ध बॉन्ड्स की लिस्ट को भी बढ़ाया है। अब इसमें 15-साल, 30-साल और 40-साल के बॉन्ड जैसे लंबी अवधि के इंस्ट्रूमेंट्स के साथ-साथ सॉवरेन ग्रीन बॉन्ड भी शामिल हैं। टैक्स की अड़चन को दूर करके, सरकार ने ग्लोबल फंड्स के लिए 'टेक-होम' यील्ड को बढ़ाया है, जिससे भारतीय डेट (Debt) दूसरे इमर्जिंग मार्केट्स के मुकाबले ज़्यादा कॉम्पिटिटिव हो गया है।

निवेशक क्यों ध्यान दे रहे हैं?

अंतर्राष्ट्रीय निवेशकों के लिए, मुख्य लक्ष्य स्थिर रिटर्न खोजना है जिसमें रिस्क मैनेजेबल हो। पहले, टैक्स की जटिलताएं अक्सर कुछ फॉरेन इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स को भारतीय डेट में निवेश करने से रोकती थीं। टैक्स स्ट्रक्चर को सरल बनाकर और बॉन्ड के विकल्पों को बढ़ाकर, भारत ने बड़े ग्लोबल फंड्स के लिए एक बड़ी बाधा को दूर किया है जो शॉर्ट-टर्म ट्रेडिंग के बजाय लॉन्ग-टर्म स्थिरता पसंद करते हैं। जब ये निवेशक टैक्स एडजस्ट करने के बाद बेहतर नेट रिटर्न देखते हैं, तो यह एसेट क्लास ज़्यादा आकर्षक हो जाती है, जिससे जून में वॉल्यूम में ऐसी वृद्धि देखी जाती है।

रिस्क और हकीकत

हालांकि इनफ्लो में वृद्धि बॉन्ड लिक्विडिटी के लिए सकारात्मक है, निवेशकों को यह याद रखना चाहिए कि एक फॉरेन इन्वेस्टर के लिए फाइनल रिटर्न बॉन्ड यील्ड से कहीं ज़्यादा बातों पर निर्भर करता है। करेंसी रिस्क एक बड़ा फैक्टर है। अगर भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले कमजोर होता है, तो बॉन्ड इंटरेस्ट से होने वाले फायदे इन्वेस्टर की होम करेंसी में कन्वर्ट होने पर खत्म हो सकते हैं। इसके अलावा, ग्लोबल इंटरेस्ट रेट्स का भी बहुत बड़ा रोल होता है। अगर अमेरिका जैसे विकसित बाजारों में ब्याज दरें बढ़ती हैं, तो यह इमर्जिंग मार्केट्स से कैपिटल को अपनी ओर खींच सकती हैं, भले ही वहां टैक्स पॉलिसी अनुकूल क्यों न हों। इसलिए, इन इनफ्लो की लॉन्ग-टर्म सफलता रुपये की स्थिरता और व्यापक ग्लोबल आर्थिक परिस्थितियों पर निर्भर करेगी।

आगे क्या देखना है?

आगे चलकर, निवेशकों के लिए सबसे अहम फैक्टर निरंतरता (Consistency) होगी। एक महीने का हाई इनफ्लो उत्साहजनक है, लेकिन मार्केट पार्टिसिपेंट्स आने वाली तिमाहियों में लगातार खरीदारी की उम्मीद करेंगे। जिन मुख्य बातों पर नज़र रखी जाएगी उनमें भारतीय रुपये की चाल, RBI की डेट मार्केट रेगुलेशन को लेकर कोई नई घोषणा, और ग्लोबल बॉन्ड यील्ड्स का प्रदर्शन शामिल है। यदि इनफ्लो स्थिर रहता है, तो यह भारतीय सरकार के उधार लेने की लागत को कम कर सकता है और डोमेस्टिक डेट मार्केट में ज़्यादा स्थिरता ला सकता है।

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