वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बैंकिंग सेक्टर में पुरानी राजनीतिक दखलअंदाजी पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने IDBI Bank के कायाकल्प का उदाहरण देते हुए बताया कि कैसे **₹25,000 करोड़** से ज्यादा के रिस्ट्रक्चरिंग पैकेज ने बैंक को प्रोफेशनल मैनेजमेंट के जरिए पटरी पर लौटाया है।
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बैंकिंग क्षेत्र में पुरानी कार्यप्रणाली पर तीखा प्रहार किया है। उन्होंने कांग्रेस के दौर में बैंकों पर पड़ने वाले राजनीतिक दबाव को 'टेलीफोन बैंकिंग' का नाम दिया है। सीतारमण के अनुसार, बैंक अब प्रोफेशनल रिस्क असेसमेंट के आधार पर काम कर रहे हैं।
IDBI Bank की कहानी
मंत्री ने बताया कि IDBI Bank को संकट से निकालने के लिए सरकार और LIC को भारी-भरकम पूंजी डालनी पड़ी। यह रकम ₹25,000 करोड़ से भी अधिक थी। इसका मकसद उन बैड लोन्स की भरपाई करना था जो Kingfisher Airlines, Videocon, ABG Shipyard और Winsome Diamonds जैसे बड़े कॉर्पोरेट घरानों को बांटे गए थे। इन लोन ने 2013-2017 के दौरान बैंकों के NPA (Non-Performing Asset) चक्र को भयावह स्थिति में पहुंचा दिया था।
रिवाइवल का सफर
निवेशकों के लिए यह जानना जरूरी है कि IDBI Bank कई साल तक Reserve Bank of India (RBI) के 'प्रॉम्प्ट करेक्टिव एक्शन' (PCA) फ्रेमवर्क के दायरे में रहा था। लेकिन बैंक ने शानदार वापसी करते हुए मार्च 2021 में इस फ्रेमवर्क से एग्जिट किया। बैंक की प्रॉफिटेबिलिटी और एसेट क्वालिटी में बड़ा सुधार देखा गया है।
आगे का रास्ता
सरकार का पूरा फोकस अब बैंकिंग सेक्टर में प्रोफेशनल गवर्नेंस पर है। Insolvency and Bankruptcy Code (IBC) जैसे सुधारों ने बैंकों के बैलेंस शीट को क्लीन किया है। अब निवेशकों की नजर सरकार और LIC द्वारा IDBI Bank में अपनी हिस्सेदारी बेचने (Strategic Disinvestment) की प्रक्रिया पर टिकी है। यह कदम सरकारी बैंकों के निजीकरण की दिशा में एक बड़ा बदलाव माना जा रहा है।
