जून 2026 तिमाही के दौरान HDFC Bank और Kotak Mahindra Bank जैसे दिग्गज प्राइवेट बैंकों में फॉरेन इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स (FIIs) ने अपनी होल्डिंग कम की है। यह ट्रेंड ग्लोबल फंड्स द्वारा पोर्टफोलियो रीबैलेंसिंग का हिस्सा है, जिसके पीछे अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी और वैल्यूएशन की चिंताएं मुख्य कारण हैं।
जून 2026 तिमाही में फॉरेन इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स (FIIs) ने भारत के सबसे बड़े प्राइवेट सेक्टर बैंकों में अपनी होल्डिंग्स कम की हैं। इस बिकवाली का असर HDFC Bank, Kotak Mahindra Bank, ICICI Bank और Axis Bank जैसे दिग्गज शेयरों पर साफ देखा गया है। निवेशकों के लिए यह समझना जरूरी है कि यह बैंकों के खराब परफॉर्मेंस की वजह से नहीं, बल्कि ग्लोबल फंड्स द्वारा अपने पोर्टफोलियो को मैनेज करने का एक तरीका है।
बिकवाली की असली वजह क्या है?
भारत में विदेशी पोर्टफोलियो का एक बड़ा हिस्सा फाइनेंशियल सर्विसेज शेयरों में होता है। ऐसे में जब ग्लोबल निवेशक रिस्क कम करना चाहते हैं, तो सबसे पहले इन 'लिक्विड' लार्ज-कैप शेयरों को ही बेचा जाता है। इसके पीछे मुख्य बाहरी कारण हैं:
- अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में उछाल।
- मजबूत होता अमेरिकी डॉलर।
- भारतीय इक्विटी का महंगा वैल्यूएशन।
सितंबर 2026 के पहले हफ्ते में ही FIIs ने भारतीय बाजार से लगभग ₹7,443 करोड़ की निकासी की है, जो इसी ट्रेंड को दर्शाता है।
क्या निवेशक बैंकिंग सेक्टर से बाहर निकल रहे हैं?
ऐसा नहीं है कि निवेशक पूरी तरह से बैंकिंग सेक्टर से बाहर हो रहे हैं। डेटा के मुताबिक, कुछ मिड-टियर बैंकों और चुनिंदा पब्लिक सेक्टर बैंकों में विदेशी निवेश में हल्की बढ़ोतरी भी देखी गई है। इसका मतलब है कि ग्लोबल फंड्स सिर्फ पैसा निकाल नहीं रहे, बल्कि वैल्युएशन के आधार पर अपनी पूंजी को दोबारा एलोकेट (reallocate) कर रहे हैं।
बाजार पर असर
ये प्राइवेट बैंक Nifty 50 और Sensex का बड़ा हिस्सा हैं। जब विदेशी निवेशक इनमें बिकवाली करते हैं, तो बाजार में वोलेटिलिटी (volatility) बढ़ना स्वाभाविक है। आने वाले समय में इन बैंकों के स्टॉक का मूवमेंट केवल इनके लोन ग्रोथ या प्रॉफिट मार्जिन पर ही नहीं, बल्कि ग्लोबल लिक्विडिटी फ्लो पर भी निर्भर करेगा। आगे चलकर तिमाही नतीजे और अमेरिकी महंगाई के आंकड़े तय करेंगे कि विदेशी निवेशकों का रुझान आगे क्या रहेगा।
