FICCI कॉन्फ्रेंस: बोर्ड की जवाबदेही पर सवाल, सोने को असेट में बदलने के नए तरीके सुझाए गए

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AuthorSaanvi Reddy|Published at:
FICCI कॉन्फ्रेंस: बोर्ड की जवाबदेही पर सवाल, सोने को असेट में बदलने के नए तरीके सुझाए गए

FICCI की 23वीं एनुअल कैपिटल मार्केट्स कॉन्फ्रेंस में विशेषज्ञों ने बोर्डरूम की कार्यप्रणाली पर चिंता जताई है। साथ ही, भारत की गोल्ड सेविंग्स को मोनेटाइज (Monetize) करने के नए तरीकों पर भी चर्चा हुई। इन बहसों से कॉर्पोरेट जवाबदेही और रिटेल इन्वेस्टमेंट प्रोडक्ट्स के भविष्य में अहम बदलावों की उम्मीद है।

बोर्डरूम में जवाबदेही की कमी पर चिंता

19 अगस्त, 2026 को FICCI द्वारा आयोजित 23वीं एनुअल कैपिटल मार्केट्स कॉन्फ्रेंस में कॉर्पोरेट गवर्नेंस और भारत में रिटेल फाइनेंशियल सेविंग्स के भविष्य को लेकर अहम मुद्दों पर चर्चा हुई। उद्योग के दिग्गजों ने बोर्डरूम के भीतर बेहतर जवाबदेही की जरूरत पर जोर दिया और घरेलू बचत को प्रोडक्टिव फाइनेंशियल असेट्स (Financial Assets) में बदलने के लिए इनोवेटिव रणनीतियों (Innovative Strategies) का सुझाव दिया।

Cyril Shroff, मैनेजिंग पार्टनर, Cyril Amarchand Mangaldas ने भारतीय कंपनियों, खासकर प्रमोटर-नियंत्रित कंपनियों में गवर्नेंस की क्वालिटी पर गंभीर चिंताएं जताईं। उन्होंने कहा कि इंडिपेंडेंट डायरेक्टर्स (Independent Directors) की प्रभावशीलता अक्सर तब कम हो जाती है, जब महत्वपूर्ण व्यावसायिक निर्णय औपचारिक बैठकों के बजाय अनौपचारिक, ऑफ-बोर्ड सेटिंग्स में लिए जाते हैं। शेयरहोल्डर्स (Shareholders) के लिए यह एक बड़ा रिस्क (Risk) है क्योंकि इससे इंडिपेंडेंट बोर्ड मेंबर्स की निष्पक्ष निगरानी (Objective Oversight) करने या मैनेजमेंट के फैसलों को चुनौती देने की क्षमता सीमित हो सकती है।

Shroff ने यह भी सवाल उठाया कि नॉमिनेशन और रेमुनरेशन कमेटियां (Nomination and Remuneration Committees) अक्सर सही लीडरशिप चुनने के बजाय सिर्फ 'रबर-स्टैम्प' (Rubber-stamp) की तरह काम करती हैं। उन्होंने बताया कि इसी तरह की ढिलाई फाइनेंशियल स्टेटमेंट्स (Financial Statements) की जांच में भी देखी जाती है। निवेशकों के लिए, ये चेतावनियां बोर्ड की संरचना (Board Composition) और कॉर्पोरेट डिस्क्लोजर्स (Corporate Disclosures) को करीब से देखने की याद दिलाती हैं, क्योंकि कमजोर गवर्नेंस ऑपरेशनल (Operational) या फाइनेंशियल जोखिमों (Financial Risks) का शुरुआती संकेत हो सकती है।

सोने को असेट में बदलने की नई राह

इसी समानांतर चर्चा में, पीएम (PM) की इकोनॉमिक एडवाइजरी काउंसिल के पार्ट-टाइम सदस्य Nilesh Shah ने सुझाव दिया कि रेगुलेटर्स (Regulators) को भारत की बड़ी फिजिकल गोल्ड (Gold) और सिल्वर (Silver) होल्डिंग्स को मोनेटाइज करने के लिए खास म्यूचुअल फंड (Mutual Fund) प्रोडक्ट्स की सुविधा देनी चाहिए। इस प्रस्ताव का मकसद रिटेल निवेशकों को अपनी बचत को बेकार पड़े फिजिकल असेट्स से निकालकर फाइनेंशियल इंस्ट्रूमेंट्स (Financial Instruments) में निवेश करने के लिए प्रोत्साहित करना है। अगर यह लागू होता है, तो ऐसे प्रोडक्ट्स फाइनेंशियल मार्केट्स में लिक्विडिटी (Liquidity) बढ़ा सकते हैं और निवेशकों को गोल्ड-लिंक्ड वेल्थ (Gold-linked Wealth) को मैनेज करने के लिए ज्यादा स्ट्रक्चर्ड (Structured) तरीके पेश कर सकते हैं।

BofA Securities India की चेयरपर्सन Kaku Nakhate ने रेगुलेटरी एजिलिटी (Regulatory Agility) की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि मौजूदा मार्केट एनवायरनमेंट (Market Environment) में सिर्फ छोटे-मोटे बदलावों के बजाय टेक्नोलॉजी-समर्थित सिस्टमैटिक बदलावों (Systemic Changes) की जरूरत है। Nakhate ने यह भी सुझाव दिया कि रेगुलेटर्स को सुधारों का एक स्पष्ट एक-साल का आउटलुक (Outlook) देना चाहिए, जिससे मार्केट पार्टिसिपेंट्स (Market Participants) अपनी स्ट्रेटेजी (Strategy) प्लान कर सकें। इसके अलावा, उन्होंने एक्सचेंज ट्रेडेड फंड्स (Exchange Traded Funds - ETFs) के मार्केट को और विकसित करने की अहमियत बताई ताकि निवेशक भागीदारी बढ़ाई जा सके।

निवेशकों के लिए, इन चर्चाओं से मुख्य बातें यह हैं कि SEBI (सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया) बोर्ड की जवाबदेही के मानकों पर क्या नए रेगुलेटरी गाइडेंस (Regulatory Guidance) जारी करता है और गोल्ड-मोनेटाइजेशन के नए प्रोडक्ट्स आते हैं या नहीं। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि कंपनियां गवर्नेंस की आलोचनाओं का जवाब कैसे देती हैं और म्यूचुअल फंड इंडस्ट्री फिजिकल असेट होल्डर्स को आकर्षित करने के लिए कैसे इनोवेट करती है, जो भारतीय वित्तीय परिदृश्य के दीर्घकालिक विकास को ट्रैक करने में मदद करेगा।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.