विदेशी बैंक रिकॉर्ड FCNR(B) डिपॉजिट को 3-5 साल के सरकारी बॉन्ड में लगा रहे हैं। इससे यील्ड (Yield) में गिरावट आ रही है और 10-साला बॉन्ड के मुकाबले स्प्रेड (Spread) चौड़ा हो गया है। RBI की स्वैप विंडो और PSL छूट के बाद यह ट्रेंड बढ़ा है, जो 30 सितंबर 2026 की डेडलाइन से पहले एक अनोखी बाजार स्थिति बना रहा है।
विदेशी बैंकों की नई रणनीति
भारत में काम कर रहे विदेशी बैंक, Foreign Currency Non-Resident (FCNR) जमा से मिली लिक्विडिटी (Liquidity) को आक्रामक तरीके से 3-से-5-साल की सरकारी सिक्योरिटीज (G-Secs) में लगा रहे हैं। अगस्त 2026 तक इस ट्रेंड ने सरकारी बॉन्ड मार्केट का रुख बदल दिया है, क्योंकि संस्थागत खरीदार छोटी अवधि की संपत्तियों (Assets) पर यील्ड पर दबाव डाल रहे हैं।
RBI के इंसेंटिव्स का कमाल
यह बदलाव काफी हद तक रेगुलेटरी इंसेंटिव्स (Regulatory Incentives) के कारण हुआ है। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) ने जून 2026 में एक कंसेशनल डॉलर स्वैप विंडो (Concessional Dollar Swap Window) शुरू की थी, ताकि इन इनफ्लो (Inflows) को बढ़ावा मिल सके और बैंकों के लिए करेंसी हेजिंग की लागत कम हो सके। इसके अलावा, 7 अगस्त 2026 को, रेगुलेटर ने FCNR(B) और NRE टर्म डिपॉजिट के खिलाफ फ्रेश एडवांसेज (Fresh Advances) को प्रायोरिटी सेक्टर लेंडिंग (PSL) की आवश्यकताओं से छूट दे दी। इन उपायों ने बैंकों को पारंपरिक क्रेडिट मार्केट की बजाय सुरक्षित, सरकारी-समर्थित संपत्तियों में फंड लगाने के लिए प्रोत्साहित किया है।
डिपॉजिट में बड़ा उछाल
मार्केट डेटा इस लिक्विडिटी डिप्लॉयमेंट (Liquidity Deployment) का पैमाना दिखाता है। 30 जुलाई 2026 तक, कुल आउटस्टैंडिंग FCNR(B) बैलेंस बढ़कर $60.55 बिलियन हो गया था, जो जून की शुरुआत में $32.56 बिलियन से काफी अधिक है। HSBC सहित विदेशी बैंक प्रमुख भागीदार रहे हैं, जिनके व्यक्तिगत डिपॉजिट बैलेंस में तेज बढ़ोतरी हुई है, क्योंकि वे 30 सितंबर 2026 को RBI की कंसेशनल स्वैप सुविधा समाप्त होने से पहले इन फंडों का उपयोग करना चाहते हैं।
बॉन्ड मार्केट पर असर
बॉन्ड मार्केट पर इसका असर यील्ड स्प्रेड (Yield Spreads) का एक उल्लेखनीय विस्तार रहा है। 3-से-5-साल की सिक्योरिटीज की मांग बढ़ने के साथ, उनकी यील्ड 10-साला बेंचमार्क बॉन्ड की तुलना में गिर गई है। यह अंतर एक ऐसे बाजार माहौल को दर्शाता है जहां बैंक अतिरिक्त लिक्विडिटी का प्रबंधन करते हुए इंटरेस्ट रेट रिस्क (Interest Rate Risk) को प्रबंधित करने के लिए छोटी अवधि की संपत्तियों को प्राथमिकता दे रहे हैं।
आगे क्या?
निवेशकों को 30 सितंबर 2026 की डेडलाइन नजदीक आने पर बाजार में संभावित अस्थिरता (Volatility) पर नजर रखनी चाहिए। मांग में अचानक बदलाव, जिसे अक्सर 'क्लिफ इफेक्ट' (Cliff Effect) कहा जाता है, कंसेशनल स्वैप विंडो बंद होने के बाद बॉन्ड मार्केट में लिक्विडिटी डायनामिक्स (Liquidity Dynamics) को बदल सकता है। हालांकि वर्तमान रणनीति बैंकों को विदेशी मुद्रा जमा को कुशलतापूर्वक प्रबंधित करने में मदद करती है, लेकिन अस्थायी रेगुलेटरी विंडो पर निर्भरता का मतलब है कि भविष्य की यील्ड ट्रेंड इस बात पर बहुत अधिक निर्भर करेगी कि RBI इन सुविधाओं का विस्तार करता है या नहीं, या बैंक प्रोत्साहन समाप्त होने के बाद कॉर्पोरेट लेंडिंग की ओर पूंजी को फिर से आवंटित करते हैं या नहीं।
