रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) की नई डॉलर-रुपया स्वैप सुविधा के बाद, विदेशी मुद्रा गैर-निवासी (बैंक) यानी FCNR(B) डिपॉजिट्स में भारी तेजी आई है। 30 जुलाई, 2026 तक ये डिपॉजिट्स बढ़कर **60.55 अरब डॉलर** हो गए हैं, जो कि जून 2026 के **32.56 अरब डॉलर** से काफी ज्यादा है। इस कदम से बैंकों को विदेशी मुद्रा जुटाने में मदद मिली है, जिसमें स्टेट बैंक ऑफ इंडिया सबसे आगे है। इस तेजी का मकसद भारत के विदेशी मुद्रा भंडार को मजबूत करना और भुगतान संतुलन को बेहतर बनाना है।
FCNR(B) डिपॉजिट्स में आई बंपर तेजी!
30 जुलाई, 2026 तक विदेशी मुद्रा गैर-निवासी (बैंक) या FCNR(B) डिपॉजिट्स में जबरदस्त उछाल देखा गया है। ये आंकड़ा 60.55 अरब डॉलर तक पहुंच गया है, जो कि 5 जून, 2026 के 32.56 अरब डॉलर की तुलना में काफी बड़ी बढ़ोतरी है। इस तेजी की मुख्य वजह 8 जून, 2026 को भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा शुरू की गई खास यूएस डॉलर-रुपया फॉरेक्स स्वैप सुविधा है। इस व्यवस्था के तहत, केंद्रीय बैंक बैंकों के लिए एक विंडो खोलता है, जिससे वे विदेशी मुद्रा डिपॉजिट्स को रुपये में बदल सकते हैं। इससे लिक्विडिटी मैनेजमेंट में मदद मिलती है और गैर-निवासी भारतीयों से डॉलर का इनफ्लो आकर्षित होता है।
SBI सबसे आगे, RBI का बड़ा सपोर्ट
इस प्रक्रिया में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) ने अहम भूमिका निभाई है। बैंक ने दो महीने से भी कम समय में 4.12 अरब डॉलर से अधिक के नए FCNR(B) डिपॉजिट्स जुटाए हैं। केंद्रीय बैंक ने भी इस पहल का समर्थन करते हुए, इन योग्य डिपॉजिट्स को कैश रिजर्व रेशियो (CRR) और स्टैच्यूटरी लिक्विडिटी रेशियो (SLR) की आवश्यकताओं से छूट दी है। आमतौर पर, ये वो हिस्से होते हैं जिन्हें बैंकों को नकदी या स्वीकृत तरल संपत्ति के रूप में रखना पड़ता है, इसलिए इन आवश्यकताओं को हटाने से बैंकों को फंड का अधिक स्वतंत्र रूप से उपयोग करने की सुविधा मिलती है।
फॉरेक्स रिजर्व और बैंक लिक्विडिटी पर असर
इस स्वैप विंडो का मुख्य उद्देश्य भारत के विदेशी मुद्रा भंडार को मजबूत करना और देश के भुगतान संतुलन को बेहतर बनाना है। बैंकों को अधिक विदेशी मुद्रा आकर्षित करने के लिए प्रोत्साहित करके, RBI का लक्ष्य करेंसी की अस्थिरता के खिलाफ एक सुरक्षा कवच प्रदान करना है। बैंकों के लिए, यह सुविधा इसलिए उपयोगी है क्योंकि यह उन्हें एक्सचेंज रेट के अत्यधिक जोखिम उठाए बिना डॉलर लिक्विडिटी का प्रबंधन करने में मदद करती है, क्योंकि स्वैप समझौता सौदे की अवधि के लिए उस जोखिम को प्रभावी ढंग से कवर करता है।
निवेशकों के लिए ज़रूरी बातें
हालांकि, निवेशकों को यह ध्यान देना चाहिए कि डिपॉजिट्स की यह वृद्धि काफी हद तक RBI की अस्थायी स्वैप सुविधा की विशिष्ट शर्तों से जुड़ी हुई है। जहां इससे अल्पावधि में डॉलर रिजर्व को बढ़ावा मिलता है, वहीं इन डिपॉजिट्स के स्तर की स्थिरता इस बात पर निर्भर करेगी कि स्वैप व्यवस्थाएं परिपक्व होने के बाद ये डिपॉजिट्स बैंकों के पास बने रहते हैं या नहीं। बैंकों के लिए इन डिपॉजिट्स की लागत और उनके नेट इंटरेस्ट मार्जिन पर अंतिम प्रभाव महत्वपूर्ण कारक होंगे जिन पर नजर रखनी होगी। इसके अतिरिक्त, ये डिपॉजिट्स भुगतान संतुलन में मदद करते हैं, लेकिन ये बैंकों के लिए देनदारियां भी हैं जिनका भविष्य में विदेशी मुद्रा में भुगतान किया जाना है।
RBI द्वारा इस स्वैप विंडो के विस्तार या वापसी के संबंध में भविष्य के अपडेट, साथ ही आगामी मासिक डेटा में रिपोर्ट की गई डिपॉजिट ग्रोथ, निवेशकों के लिए बैंकिंग क्षेत्र की लिक्विडिटी और विदेशी रिजर्व की सेहत पर स्थायी प्रभाव को समझने के लिए महत्वपूर्ण बिंदु होंगे।
