FCNR डिपॉजिट्स ₹60.55 बिलियन पार, StanChart का बड़ा कदम

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AuthorSaanvi Reddy|Published at:
FCNR डिपॉजिट्स ₹60.55 बिलियन पार, StanChart का बड़ा कदम

RBI की खास स्वैप स्कीम के चलते भारत में FCNR (B) डिपॉजिट्स जुलाई 2026 तक लगभग दोगुना होकर $60.55 बिलियन तक पहुंच गए हैं। Standard Chartered जैसे बैंक भारी इनफ्लो को मैनेज कर रहे हैं और अतिरिक्त फंड को डोमेस्टिक बैंकिंग सिस्टम में लगा रहे हैं। इस बीच, स्कीम की सितंबर की डेडलाइन से पहले मार्केट पार्टिसिपेंट्स लिक्विडिटी लेवल्स पर नजर रख रहे हैं।

FCNR डिपॉजिट्स में तूफानी तेजी!

भारत में फॉरेन करेंसी नॉन-रेसिडेंट (FCNR) बैंक डिपॉजिट्स में गजब की तेजी आई है। 30 जुलाई 2026 तक कुल आउटस्टैंडिंग अमाउंट $60.55 बिलियन हो गया है, जो 5 जून को रिपोर्ट किए गए $32.56 बिलियन से काफी ज्यादा है। यह उछाल रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) द्वारा 8 जून 2026 को लॉन्च की गई स्पेशल स्वैप विंडो के बाद आया है। इस स्कीम का मकसद फॉरेन कैपिटल को आकर्षित करना और बैंकों के लिए करेंसी रिस्क कम करके रुपए को सपोर्ट करना था।

विदेशी बैंकों का बड़ा योगदान

इस कैपिटल इनफ्लो में फॉरेन बैंक सबसे आगे रहे हैं। Standard Chartered ने इस स्कीम के तहत बड़ी मात्रा में डिपॉजिट्स जुटाए हैं। बैंक के मुताबिक, उनके पास फिलहाल इतनी लिक्विडिटी है कि वे उसे इंटरनली पूरी तरह इस्तेमाल नहीं कर पा रहे हैं। इस अतिरिक्त फंड को मैनेज करने के लिए, बैंक इसे डोमेस्टिक लेंडर्स को उधार दे रहा है, जिससे कैपिटल भारतीय बैंकिंग सिस्टम तक पहुंच रहा है। HSBC, स्टेट बैंक ऑफ इंडिया और ICICI बैंक जैसे बड़े लेंडर्स भी डिपॉजिट्स जुटाने में अहम भूमिका निभा रहे हैं।

बॉन्ड मार्केट पर असर

बैंकिंग सिस्टम में अचानक बढ़ी हुई लिक्विडिटी का सरकारी बॉन्ड मार्केट पर भी असर दिख रहा है। इन डॉलर डिपॉजिट्स को पाने वाले बैंक इन्हें रुपए में कन्वर्ट कर रहे हैं और शॉर्ट-टर्म सरकारी सिक्योरिटीज में निवेश कर रहे हैं। शॉर्ट-टर्म डेट की इस बढ़ी हुई डिमांड से बॉन्ड की कीमतें बढ़ गई हैं, जिससे पांच-साल के सरकारी बॉन्ड यील्ड्स में गिरावट आई है। नतीजतन, अगस्त की शुरुआत में पांच-साल के बेंचमार्क यील्ड और 10-साल के बेंचमार्क यील्ड के बीच का अंतर (स्प्रेड) लगभग 40 बेसिस पॉइंट्स तक बढ़ गया है, जो पिछले स्तरों से ज्यादा है।

रिस्क और आगे की राह

हालांकि फॉरेन कैपिटल का यह इनफ्लो तत्काल लिक्विडिटी दे रहा है, लेकिन इन्वेस्टर्स और मार्केट एनालिस्ट्स संभावित रिस्क पर भी नजर रख रहे हैं। सबसे बड़ी चिंता RBI की स्वैप विंडो की अस्थायी प्रकृति है, जिसकी नई डिपॉजिट्स के लिए डेडलाइन 30 सितंबर 2026 है। इस फैसिलिटी पर निर्भरता का मतलब है कि विंडो बंद होने के बाद बैंकिंग सेक्टर को लिक्विडिटी एडजस्टमेंट का सामना करना पड़ सकता है, जिससे यह अनिश्चितता बढ़ जाती है कि बैंक इन फंड्स को लंबे समय तक कैसे मैनेज करेंगे।

इसके अलावा, इस कैपिटल इनफ्लो की असरदारता बड़े मैक्रोइकॉनॉमिक फैक्टर्स से जुड़ी हुई है। जियोपॉलिटिकल बदलाव, ग्लोबल इंटरेस्ट रेट्स में संभावित अस्थिरता और करेंसी में उतार-चढ़ाव यह तय करते रहेंगे कि फॉरेन कैपिटल भारत में कैसे आएगा और बाहर जाएगा। इन्वेस्टर्स सितंबर की डेडलाइन नजदीक आते ही बैंकिंग लिक्विडिटी, बॉन्ड यील्ड मूवमेंट्स और स्वैप विंडो से जुड़ी किसी भी आधिकारिक जानकारी पर बारीकी से नजर रखेंगे, ताकि इंटरेस्ट रेट्स और बैंक बैलेंस शीट्स पर पड़ने वाले संभावित असर का अंदाजा लगाया जा सके।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.