हालिया डेटा से पता चलता है कि आक्रामक तरीके से FCNR डिपॉजिट जुटाने के चक्कर में प्राइवेट बैंकों के नेट इंटरेस्ट मार्जिन (NIM) पर दबाव बढ़ा है। विदेशी मुद्रा फंड्स को सही समय पर लोन के रूप में न लगा पाने के कारण बैंकों को यह महंगा सौदा पड़ा है।
सितंबर तिमाही में भारतीय प्राइवेट सेक्टर बैंकों के मुनाफे पर दबाव साफ नजर आया है। इसकी बड़ी वजह बैंकों द्वारा आक्रामक तरीके से FCNR(B) डिपॉजिट्स (नॉन-रेजिडेंट इंडियंस द्वारा रखी गई विदेशी मुद्रा जमा) को जुटाना रहा है। हालांकि इस रणनीति से बैंकों का डिपॉजिट बेस तो मजबूत हुआ, लेकिन इन फंड्स को तुरंत हाई-यील्ड लोन के रूप में न लगा पाने के कारण 'लिक्विडिटी ड्रैग' पैदा हुआ, जिससे NIM यानी नेट इंटरेस्ट मार्जिन घट गए।
प्रमुख बैंकों का हाल
डेटा के मुताबिक, Kotak Mahindra Bank पर इसका सबसे बुरा असर दिखा, जहां मार्जिन में साल-दर-साल 44 बेसिस पॉइंट्स की गिरावट आई और यह 4.1% पर आ गया। वहीं, Axis Bank के मार्जिन में 37 बेसिस पॉइंट्स की कमी देखी गई। HDFC Bank और ICICI Bank भी इससे अछूते नहीं रहे, जहां मार्जिन क्रमशः 14 और 12 बेसिस पॉइंट्स गिरे।
इसके उलट, सरकारी बैंकों ने बेहतर स्थिति दिखाई क्योंकि उनके कुल डिपॉजिट बेस में FCNR(B) का हिस्सा सिर्फ 2 से 2.5% के बीच था, जबकि प्राइवेट बैंकों में यह 7.5 से 10% तक था। Union Bank of India और Central Bank of India के मार्जिन में तो बढ़त दर्ज की गई है।
आगे क्या उम्मीद है?
बैंक मैनेजमेंट इसे एक 'ट्रांजिशनल फेज' मान रहा है। अब ये फंड्स धीरे-धीरे लोन बुक्स और रेपो-लिंक्ड एसेट्स में शिफ्ट हो रहे हैं। उम्मीद की जा रही है कि दिसंबर तिमाही से मार्जिन का दबाव कम होने लगेगा। निवेशकों के लिए अब नजर इस बात पर होगी कि बैंक कितनी तेजी से इस बेकार पड़ी लिक्विडिटी को ब्याज कमाने वाले एसेट्स में बदलते हैं।
