Canara Bank का 90 साल के ग्राहक से पॉलिसी झोल: Bancassurance में सिस्टमैटिक गड़बड़ियों का पर्दाफाश!

BANKINGFINANCE
Whalesbook Logo
AuthorSaanvi Reddy|Published at:
Canara Bank का 90 साल के ग्राहक से पॉलिसी झोल: Bancassurance में सिस्टमैटिक गड़बड़ियों का पर्दाफाश!
Overview

एक **90 वर्षीय** ग्राहक को **2124** में परिपक्व (mature) होने वाली जीवन बीमा पॉलिसी बेचने के मामले ने Canara Bank और भारत के बैंकेश्योरेंस (Bancassurance) मॉडल पर सवालों के घेरे खड़े कर दिए हैं। यह घटना बिक्री इंसेंटिव (sales incentives) से प्रेरित सिस्टमैटिक मिस-सेलिंग (mis-selling) को उजागर करती है, जहाँ सालाना लाखों पॉलिसीधारकों को अनुपयुक्त उत्पादों का सामना करना पड़ता है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने उपयुक्तता, स्पष्ट सहमति और रिफंड को अनिवार्य बनाने के लिए प्रस्तावित गाइडलाइन्स जारी की हैं, लेकिन इनका प्रभावी कार्यान्वयन (enforcement) ही असली चुनौती है।

यह मामला तब सामने आया जब Canara Bank के एक 90 वर्षीय ग्राहक को एक ऐसी जीवन बीमा पॉलिसी बेची गई, जो 2124 में जाकर परिपक्व (mature) होगी। इस 'बेमेल' पॉलिसी की खबर सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद हड़कंप मच गया। बैंक ने तुरंत कार्रवाई करते हुए ग्राहक को पॉलिसी का पूरा पैसा, जिसमें ₹2 लाख का वार्षिक प्रीमियम भी शामिल था, वापस कर दिया। लेकिन यह घटना भारत के वित्तीय सेवा क्षेत्र में बैंकेश्योरेंस (Bancassurance) मॉडल की एक गंभीर और गहरी समस्या की ओर इशारा करती है – यह सिर्फ एक बैंक का मामला नहीं, बल्कि एक सिस्टमैटिक गड़बड़ी का संकेत है।

यह कोई अकेली घटना नहीं है। भारतीय बीमा नियामक और विकास प्राधिकरण (IRDAI) के आंकड़ों के अनुसार, फाइनेंशियल ईयर 2024-25 में बीमा से जुड़ी 2.5 लाख से ज़्यादा शिकायतें दर्ज हुईं। इनमें से लगभग 1.2 लाख शिकायतें जीवन बीमा से संबंधित थीं। चिंता की बात यह है कि 'अनुचित व्यापार प्रथाओं' (unfair business practices) के तहत आने वाली शिकायतें, जिनमें मिस-सेलिंग और गलत जानकारी देना शामिल है, जीवन बीमा शिकायतों का 22% से ज़्यादा हैं और इनमें लगातार बढ़ोतरी देखी जा रही है।

इस पूरी स्थिति पर संज्ञान लेते हुए, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने अपनी प्रस्तावित गाइडलाइन्स जारी की हैं। इन नियमों का मकसद ग्राहकों की ज़रूरतों का ठीक से आकलन करना, स्पष्ट सहमति लेना और मिस-सेलिंग के मामलों में ग्राहकों को रिफंड दिलाना सुनिश्चित करना है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि 60 साल से ज़्यादा उम्र के ग्राहकों के लिए सेल्स में ऑटोमेटिक हाई-रिस्क फ्लैगिंग (high-risk flagging) होनी चाहिए और उत्पाद की समझ सुनिश्चित करने के लिए कन्वर्सेशन को रिकॉर्ड करना अनिवार्य होना चाहिए। RBI की नई गाइडलाइन्स 1 जुलाई, 2026 से लागू हो सकती हैं, जिसमें बैंक कर्मचारियों को तीसरे पक्ष से इंसेंटिव (incentives) देने पर रोक और उत्पादों की बंडलिंग (bundling) पर प्रतिबंध शामिल है।

भारत का बैंकेश्योरेंस मार्केट बहुत बड़ा है, और साल 2034 तक इसके USD 182.08 बिलियन तक पहुंचने का अनुमान है। इसमें लाइफ बैंकेश्योरेंस की हिस्सेदारी 60% है। सरकारी बैंक, जैसे Canara Bank, अपने विशाल ब्रांच नेटवर्क का इस्तेमाल करते हैं, जो उन्हें दूर-दराज के ग्राहकों तक पहुंचाता है। Canara Bank का शेयर 12 फरवरी, 2026 को लगभग ₹145.51 पर ट्रेड कर रहा था, जिसका मार्केट कैप करीब ₹1.31 लाख करोड़ और P/E रेश्यो लगभग 7.23x था। ऐसे माहौल में, ग्राहकों पर केंद्रित जांच से बैंक की पब्लिक इमेज और भविष्य की रेगुलेटरी कार्रवाइयों पर असर पड़ सकता है। लेकिन अगर सेल्स टारगेट पूरे करने का दबाव ज़्यादा हो, तो बैंक स्टाफ ग्राहकों की ज़रूरतों की परवाह किए बिना उत्पाद बेच सकता है। यह दबाव ही ग्राहकों की उपयुक्तता (suitability) को नज़रअंदाज़ करने का सबसे बड़ा कारण बनता है।

Canara Bank के लिए यह मामला सिर्फ हालिया नहीं, बल्कि अतीत के कुछ नियामकीय मुद्दों की याद भी दिलाता है। साल 2018 में, बैंक की यूके शाखा पर एंटी-मनी लॉन्ड्रिंग (anti-money laundering) नियमों के उल्लंघन के लिए £890,000 का जुर्माना लगाया गया था। इसके अलावा, RBI से भी बैंक को नियमों के पालन में लापरवाही के लिए कई बार जुर्माना भरना पड़ा है। हाल ही में 2024 में, ऐसी खबरें भी आई थीं कि Canara Bank के कुछ अधिकारी कर्मचारियों को टारगेट पूरे न करने पर मौखिक दुर्व्यवहार (verbal abuse) का शिकार बना रहे थे, जो बिक्री के दबाव से जुड़ी आंतरिक संस्कृति की ओर इशारा करता है।

RBI की प्रस्तावित गाइडलाइन्स भारत के बैंकेश्योरेंस सेक्टर के लिए एक महत्वपूर्ण कदम हैं। लेकिन इनका असल असर इस बात पर निर्भर करेगा कि इन्हें कितनी सख्ती से लागू किया जाता है। क्या ये पेनल्टी (penalties) ब्रांच लेवल पर इंसेंटिव को बदलने के लिए काफी होंगी? क्या बार-बार नियम तोड़ने वाले बैंकों पर नियामकीय शिकंजा और कसा जाएगा? क्या इंफोर्समेंट (enforcement) की कार्रवाई को सार्वजनिक किया जाएगा ताकि दूसरों को भी सबक मिले? स्पष्ट, रिकॉर्डेड सहमति और इंसेंटिव-ड्राइव बिक्री पर रोक लगाना अच्छी बात है, लेकिन असली परीक्षा यह सुनिश्चित करने में होगी कि ये उपाय सिर्फ कागजी कार्रवाई न बनकर ग्राहकों की सुरक्षा का असली ढाल बनें। जब तक ऐसा नहीं होता, खासकर बुजुर्गों और कमज़ोर तबकों के साथ मिस-सेलिंग का खतरा बना रहेगा।

Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.