Eisner Advisory Group ने अपने बिजनेस मॉडल में बड़ा बदलाव किया है। कंपनी अब पारंपरिक 'घंटे के हिसाब से बिलिंग' (Hourly Billing) को छोड़कर 'वैल्यू-बेस्ड' और 'सब्सक्रिप्शन' मॉडल की ओर बढ़ रही है। इस बदलाव को रफ्तार देने के लिए कंपनी अपने इंडियन GCC को और बड़ा कर रही है, जो पहले ही कंपनी के कुल रेवेन्यू में **23%** का योगदान दे रहा है।
बिजनेस मॉडल में बड़ा बदलाव
Eisner Advisory Group के CEO चार्ल्स वेनस्टीन ने साफ कर दिया है कि कंपनी अगले 6 से 18 महीनों के भीतर पूरी तरह से नए बिलिंग स्ट्रक्चर पर शिफ्ट हो जाएगी। सालों से चली आ रही कंसल्टेंसी की 'टाइम एंड मटेरियल' प्रथा को खत्म कर कंपनी अब आउटकम-बेस्ड (रिजल्ट पर आधारित) मॉडल अपना रही है। इसका सीधा मतलब यह है कि क्लाइंट्स को उनके काम के घंटों के लिए नहीं, बल्कि मिलने वाले सटीक नतीजों के लिए भुगतान करना होगा।
इंडिया GCC की अहम भूमिका
कंपनी के इस बड़े बदलाव का इंजन भारत में स्थित इसका ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर (GCC) है। अभी भारत से कंपनी के ग्लोबल रेवेन्यू का 23% हिस्सा आता है। Eisner अब इन भारतीय टीमों को अपने ग्लोबल स्ट्रैटेजी के केंद्र में रख रही है, ताकि US-बाउंड स्टार्टअप्स को बेहतर एडवाइजरी सर्विसेज दी जा सकें और लागत को भी कम रखा जा सके।
AI का तड़का और चुनौतियां
इस पूरी प्रक्रिया को ऑटोमेट करने के लिए कंपनी ने 11 इन-हाउस AI टूल्स तैयार किए हैं। ये टूल्स ऑडिट और फाइनेंशियल कार्यों को तेजी और सटीकता के साथ पूरा करेंगे, जिससे कम स्टाफ के साथ ज्यादा काम निपटाया जा सकेगा। हालांकि, यह बदलाव आसान नहीं है। क्लाइंट्स के साथ 'वैल्यू' को मापने को लेकर पारदर्शिता बनाए रखना एक बड़ी चुनौती होगी। यदि AI टूल्स के इंटीग्रेशन में देरी हुई या क्वालिटी से समझौता हुआ, तो यह कंपनी की साख पर भारी पड़ सकता है। भारतीय IT और कंसल्टिंग कंपनियों के लिए यह मॉडल एक बड़ा केस स्टडी है, क्योंकि भविष्य में उन्हें भी अपने क्लाइंट्स की बदलती जरूरतों के हिसाब से अपने बिलिंग स्ट्रक्चर को बदलना पड़ सकता है।
