इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) का बीमा पारंपरिक ईंधन वाली गाड़ियों की तुलना में **14%** ज्यादा महंगा साबित हो रहा है। इसकी मुख्य वजह बैटरी की भारी-भरकम लागत और रिपेयरिंग के सीमित ऑप्शंस हैं।
क्लेम का बढ़ा हुआ बोझ
लेटेस्ट इंडस्ट्री डेटा के अनुसार, एक इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) के लिए औसत क्लेम सीवियरिटी ₹41,543 है, जबकि पारंपरिक ICE (Internal Combustion Engine) गाड़ियों के लिए यह आंकड़ा ₹36,185 के आसपास है। यह साफ दिखाता है कि EV मालिकों को बीमा के मामले में ज्यादा खर्च उठाना पड़ रहा है।
बैटरी है सबसे बड़ी वजह
इस खर्च के पीछे सबसे बड़ा कारण है 'बैटरी पैक', जो EV की कुल कीमत का 40% से 60% हिस्सा होता है। छोटी सी टक्कर भी अगर बैटरी को नुकसान पहुंचाती है, तो रिपेयरिंग का बिल आसमान छूने लगता है। इसके अलावा, भारत में हाई-वोल्टेज बैटरी को ठीक करने वाले स्वतंत्र गैरेजों का नेटवर्क अभी काफी सीमित है, जिसके कारण मालिकों को मजबूरन ऑथोराइज्ड सर्विस सेंटर्स पर निर्भर रहना पड़ता है, जहां लेबर और पार्ट्स की लागत काफी ज्यादा होती है।
मॉनसून का खतरा और बढ़ती चिंता
बरसात के मौसम में यह रिस्क और बढ़ जाता है। भारी बारिश के दौरान पानी भरने की स्थिति में क्लेम की राशि ₹65,000 तक पहुंच सकती है। इसी डर के कारण अब ग्राहक 'बैटरी प्रोटेक्शन' और 'जीरो-डिप्रीसिएशन' जैसे खास इंश्योरेंस ऐड-ऑन्स लेना पसंद कर रहे हैं।
इंश्योरेंस कंपनियों के लिए चुनौती
इंश्योरेंस कंपनियों के लिए यह स्थिति पेचीदा है। एक तरफ सरकार थर्ड-पार्टी प्रीमियम पर 15% की छूट दे रही है, तो दूसरी तरफ क्लेम की गंभीरता कंपनियों के मुनाफे पर असर डाल रही है। डेटा के मुताबिक, टियर-2 शहरों में 100 गाड़ियों पर 33 क्लेम आ रहे हैं, जो टियर-1 शहरों (प्रति 100 पर 30 क्लेम) के मुकाबले ज्यादा है। जैसे-जैसे EV का विस्तार छोटे शहरों में बढ़ेगा, रिपेयर इंफ्रास्ट्रक्चर का विकास ही इस प्रीमियम को स्टेबल रखने का एकमात्र जरिया होगा।
