ESOP Tax Conflict: अनएक्सरसाइज्ड ESOP पेआउट पर अदालतों में मतभेद, कंपनियों की बढ़ी टेंशन

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AuthorSaanvi Reddy|Published at:
ESOP Tax Conflict: अनएक्सरसाइज्ड ESOP पेआउट पर अदालतों में मतभेद, कंपनियों की बढ़ी टेंशन

अनएक्सरसाइज्ड ESOP पेआउट पर टैक्स कैसे लगाया जाए, इसे लेकर अदालतों के अलग-अलग फैसलों ने भारतीय कंपनियों के लिए असमंजस की स्थिति पैदा कर दी है। इससे बायबैक और मर्जर के दौरान टैक्स कटौती और कानूनी जोखिम बढ़ गए हैं।

भारतीय कंपनियां और कर्मचारी इस समय ESOP (एम्प्लॉयी स्टॉक ऑप्शन प्लान) से मिलने वाली रकम पर टैक्स को लेकर भारी अनिश्चितता का सामना कर रहे हैं। जब कोई कंपनी कर्मचारी द्वारा ऑप्शन एक्सरसाइज करने से पहले ही उसे वापस खरीद लेती है या खत्म कर देती है, तो उस पर टैक्स कैसे लगे, इसे लेकर कानून विशेषज्ञों और अदालतों के बीच कोई एक राय नहीं है। यह फाइनेंस डिपार्टमेंट के लिए बड़ी सिरदर्दी बन गया है कि इस पेमेंट को 'सैलरी परक्विजिट' माना जाए या फिर 'कैपिटल गेन'।

अदालती फैसलों का पेंच

पूरा विवाद इस बात पर है कि इनकम पर टैक्स की दर क्या होगी। अगर इसे सैलरी परक्विजिट माना जाता है, तो इस पर स्लैब रेट के हिसाब से भारी टैक्स लग सकता है। वहीं, अगर इसे कैपिटल गेन माना जाए, तो टैक्स रेट काफी कम हो सकता है।

इस पर कोई स्पष्ट नियम न होने के कारण स्थिति उलझी हुई है। उदाहरण के लिए, Income Tax Appellate Tribunal (Bangalore) ने Pramod Kumar Jain केस में इसे कैपिटल एसेट माना। वहीं, Madras High Court ने जुलाई 2024 में फैसला सुनाया कि यह एम्प्लॉयमेंट रिलेशनशिप से मिला लाभ है और इसे सैलरी परक्विजिट के तौर पर टैक्स किया जाना चाहिए। इसके उलट, Delhi और Karnataka High Court के फैसलों ने इस भ्रम को और बढ़ा दिया है क्योंकि उनका मानना है कि ये भुगतान जरूरी नहीं कि सैलरी परक्विजिट ही हों।

कंपनियों के सामने ऑपरेशनल चुनौती

कॉर्पोरेट रीस्ट्रक्चरिंग जैसे कि बायबैक, मर्जर और एक्विजिशन के दौरान यह कानूनी अस्पष्टता बड़ी रिस्क बन गई है। जब कोई कंपनी ESOP प्लान को बदलती है या कैंसिल करती है, तो उसे यह तय करना होता है कि TDS (टैक्स डिडक्टेड एट सोर्स) किस आधार पर काटे।

ज्यादातर कंपनियां फिलहाल सुरक्षा के लिहाज से इसे 'सैलरी परक्विजिट' मानकर TDS काट रही हैं। इससे कंपनियों पर पेनल्टी का खतरा तो कम हो जाता है, लेकिन यह कर्मचारियों के लिए नुकसानदेह साबित होता है क्योंकि वे कम कैपिटल गेन टैक्स का फायदा नहीं उठा पाते। अब सबकी नजरें Central Board of Direct Taxes (CBDT) की ओर हैं कि क्या वे कोई स्पष्ट गाइडलाइंस या सर्कुलर जारी करेंगे, जिससे देश भर में एक समान टैक्स फ्रेमवर्क लागू हो सके।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.