यील्ड (Yield) घटने का संकट
EPFO की निवेश समिति ने ₹1,250 करोड़ के DMEDL NCD (नॉन-कनवर्टिबल डिबेंचर) के वॉलंटरी बायबैक में भाग लेने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। यह इस बायबैक का चौथा दौर है, जिसमें प्रति बॉन्ड (bond) ₹1.03 लाख का बायबैक मूल्य रखा गया है, जो पिछले दौरों के ₹1.05 लाख से कम है। असली चिंता की बात यह है कि इन NCDs पर फिलहाल 7.97% की सालाना यील्ड मिल रही है। वहीं, नए निवेश पर अनुमानित यील्ड सिर्फ 7.6% रहने की उम्मीद है। ऐसे में, फंड मैनेजर्स के लिए यह तय करना एक चुनौती है कि क्या मौजूदा बॉन्ड्स को बेचकर कम यील्ड वाले नए इंस्ट्रूमेंट्स में पैसा लगाना फायदे का सौदा होगा, खासकर जब बात लंबी अवधि की कमाई की हो।
CBT का बड़ा फैसला: सदस्यों के ब्याज दरों पर अंतिम मुहर
इस पूरे मामले का अंतिम फैसला EPFO के शीर्ष निकाय, सेंट्रल बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज (CBT) को लेना है, जिनकी जल्द ही बैठक होने वाली है। CBT न सिर्फ इस बायबैक प्रस्ताव पर मुहर लगाएगी, बल्कि 30 करोड़ से ज्यादा सदस्यों के लिए अगले फाइनेंशियल ईयर की ब्याज दर का भी ऐलान करेगी। CBT को इस बात का ध्यान रखना होगा कि फंड की लिक्विडिटी (liquidity) यानी नकदी की जरूरतें भी पूरी हों और सदस्यों को अच्छी रिटर्न भी मिलती रहे। मौजूदा बाजार के हालात देखें तो, 10 साल के सरकारी बॉन्ड्स (Government Bonds) पर मार्च 2026 तक करीब 7.15% से 7.25% की यील्ड मिल रही है। EPFO की निवेश नीति के तहत 'AAA' जैसी हाई क्रेडिट रेटिंग वाले NCDs में निवेश की इजाजत है, जैसे DMEDL के बॉन्ड्स।
री-इन्वेस्टमेंट (Re-investment) का जोखिम और आय में कमी
इस बायबैक के फैसले में सबसे बड़ा जोखिम 'री-इन्वेस्टमेंट' (re-investment) का है। अगर EPFO 7.97% यील्ड वाले बॉन्ड्स को बेचकर 7.6% यील्ड वाले नए इंस्ट्रूमेंट्स में पैसा लगाता है, तो फंड को सालाना बड़ा नुकसान हो सकता है। मार्च 2023 तक EPFO के पास लगभग ₹15.41 लाख करोड़ की संपत्ति थी। 0.37% (7.97% - 7.6%) की इस कमी से भी हर साल करोड़ों का घाटा हो सकता है। यह भी चिंता की बात है कि पिछले कुछ सालों में EPFO सदस्यों को 8.10% से 8.15% तक का ब्याज दे चुका है। ऐसे में, कम यील्ड वाले निवेश सदस्यों के लिए ब्याज दरों को बनाए रखने की क्षमता को सीमित कर सकते हैं। यह कदम फंड की प्राथमिकता बदलने का संकेत भी दे सकता है, जहां यील्ड की जगह लिक्विडिटी या इश्यूअर (issuer) के साथ संबंधों को ज्यादा महत्व दिया जा रहा हो।
इश्यूअर (Issuer) की रणनीति और बाजार के संकेत
आमतौर पर ऐसे बायबैक इश्यूअर यानी DMEDL जैसी कंपनियों की ओर से शुरू किए जाते हैं। DMEDL भी अपनी डेट प्रोफाइल (debt profile) को मैनेज करने, कम दरों पर रीफाइनेंस करने या अपने कर्ज को कम करने की रणनीति पर काम कर रहा होगा। हालांकि, DMEDL की एक्सप्रेसवे परियोजनाओं के वित्तीय प्रदर्शन का विवरण अभी सार्वजनिक नहीं है, लेकिन बड़ी इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनियों द्वारा बाजार की बदलती स्थितियों के जवाब में ऐसे बायबैक आम हैं।
आगे का रास्ता
आने वाली CBT बैठक EPFO की निवेश रणनीति और सदस्यों को मिलने वाले रिटर्न की दिशा तय करेगी। मौजूदा बाजार में, जहां सरकारी बॉन्ड्स से मध्यम रिटर्न मिल रहा है, 7.6% से ऊपर यील्ड वाले नए निवेश विकल्प खोजना मुश्किल हो सकता है। CBT का फैसला यह भी बताएगा कि फंड जोखिम लेने में कितना इच्छुक है और वह कैसे ब्याज दरों के इस जटिल माहौल में सदस्यों की उम्मीदों को पूरा करने के लिए संतुलन बनाएगा।