Enforcement Directorate (ED) ने 'डिजिटल अरेस्ट' से जुड़े एक बड़े मनी लॉन्ड्रिंग नेटवर्क का पर्दाफाश किया है। जालसाजों ने RBI से लाइसेंस प्राप्त मनी एक्सचेंज फर्मों और शेल कंपनियों का इस्तेमाल कर **₹27,850 करोड़** का अवैध लेनदेन किया, जो वित्तीय जगत के लिए एक बड़ा रेड अलर्ट है।
देश भर में बढ़ते 'डिजिटल अरेस्ट' साइबर क्राइम के पीछे एक बहुत बड़ा मनी लॉन्ड्रिंग सिंडिकेट काम कर रहा था। प्रवर्तन निदेशालय (ED) की जांच में सामने आया है कि कैसे इन जालसाजों ने ₹27,850 करोड़ की काली कमाई को सफेद करने के लिए RBI से मान्यता प्राप्त मनी चेंजर्स और कमोडिटी ट्रेडिंग फर्मों का इस्तेमाल किया। इस पूरे मामले का खुलासा तब हुआ जब गोवा के एक पीड़ित से ₹2.6 करोड़ की धोखाधड़ी की गई।
कैसे काम करता था यह सिंडिकेट?
जांच में पता चला कि आरोपियों ने पैसों के ट्रेल को छुपाने के लिए करीब 400 बैंक खातों का इस्तेमाल किया। इन फर्मों को चलाने के लिए ऐसे लोगों को 'स्ट्रॉ डायरेक्टर' बनाया गया था, जो अक्सर ड्राइवर या कम आय वाले कर्मचारी होते थे, ताकि असली मास्टरमाइंड कानून की पकड़ से दूर रहें। डेटा के मुताबिक, ₹2,904 करोड़ कैश डिपॉजिट के जरिए और ₹584 करोड़ बल्क नोट एक्सेप्टेंस मशीनों के जरिए प्रोसेस किए गए। ED ने अब तक मुख्य आरोपी फहीम मोइन हुसैन सैयद और नईम मुईन सैयद को गिरफ्तार किया है और ₹30 करोड़ से ज्यादा की संपत्ति फ्रीज कर दी है।
निवेशकों और बाजार पर क्या होगा असर?
यह केस नॉन-बैंकिंग और फॉरेक्स इंटरमीडियरी सेक्टर के लिए बड़ा सबक है। भविष्य में इन कंपनियों के लिए KYC और एंटी-मनी लॉन्ड्रिंग (AML) नियमों को और अधिक कड़ा किया जा सकता है। अब ऐसी फर्मों को अधिक ऑडिट और कड़ी निगरानी का सामना करना पड़ सकता है, जिससे ऑपरेटिंग कॉस्ट बढ़ सकती है। यह जांच फिलहाल 20 राज्यों की 163 पुलिस शिकायतों से जुड़ी है, जो आने वाले समय में और भी कई छोटी-बड़ी वित्तीय संस्थाओं की मुश्किलें बढ़ा सकती है।
