Enforcement Directorate (ED) ने **₹28,000 करोड़** के साइबर फ्रॉड और मनी लॉन्ड्रिंग मामले में एडवोकेट राधेश उपाध्याय को गिरफ्तार किया है। यह सिंडिकेट 'डिजिटल अरेस्ट' के जरिए लोगों को ठगता था और शेल कंपनियों का इस्तेमाल कर काला धन खपाता था।
एजेंसी ने एडवोकेट राधेश उपाध्याय को मुंबई के छत्रपति शिवाजी महाराज इंटरनेशनल एयरपोर्ट से हिरासत में लिया है। यह मामला 20 से ज्यादा राज्यों में फैला है और जांच के दायरे में कुल ₹28,000 करोड़ का ट्रांजैक्शन है।
कैसे काम करता था यह 'डिजिटल अरेस्ट' सिंडिकेट?
धोखेबाज सरकारी अधिकारी बनकर वीडियो कॉल करते थे और लोगों को कानूनी कार्रवाई का डर दिखाकर मोटी रकम वसूलते थे। जांच की शुरुआत जून 2025 में गोवा पुलिस के पास दर्ज एक शिकायत से हुई, जिसमें पीड़ित को ₹2.60 करोड़ का चूना लगाया गया था।
पैसों को ठिकाने लगाने के लिए इस नेटवर्क ने करीब 400 'म्यूल' बैंक अकाउंट्स का जाल बुना था। इन खातों को ट्रैवल, कमोडिटी और फॉरेन एक्सचेंज जैसी शेल कंपनियों के नाम पर चलाया जा रहा था ताकि इसे बिजनेस ट्रांजैक्शन का रूप दिया जा सके। बाद में इन पैसों को कैश में निकालकर हवाला (अंगड़िया सिस्टम) के जरिए फॉरेन करेंसी में बदला जाता था।
प्रोफेशनल मदद और कंप्लायंस का खतरा
ईडी के आरोपों के मुताबिक, राधेश उपाध्याय का काम कानून की पैरवी करना नहीं, बल्कि सरकारी एजेंसियों द्वारा फ्रीज किए गए बैंक खातों को रिश्वत देकर छुड़वाना था। यह केस उन प्रोफेशनल बिचौलियों के लिए एक बड़ा सबक है जो अपनी क्रेडेंशियल्स का दुरुपयोग कर एंटी-मनी लॉन्ड्रिंग (AML) प्रोटोकॉल को धता बताते हैं।
अभी तक इस नेटवर्क से जुड़े 160 से ज्यादा FIR दर्ज हो चुके हैं और 300 पीड़ित सामने आए हैं। अब ईडी उन अधिकारियों की तलाश में है जिन्होंने रिश्वत ली थी। आने वाले समय में ट्रैवल और फॉरेक्स सेक्टर में कड़ी नियामक सख्ती देखने को मिल सकती है।
