प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (EAC-PM) ने सरकारी बैंकों के विलय का सुझाव दिया है, लेकिन सरकार ने साफ कर दिया है कि अभी ऐसा कोई भी प्लान पाइपलाइन में नहीं है। निवेशकों के लिए फिलहाल सबसे जरूरी क्या है, आइए जानते हैं।
विलय पर क्या है सच?
हाल ही में EAC-PM के एक वर्किंग पेपर में यह सुझाव दिया गया है कि भारत के 'विकसित भारत 2047' के लक्ष्य को पूरा करने के लिए सरकारी बैंकों को बड़े संस्थानों में विलय करना चाहिए। हालांकि, निवेशकों को यह ध्यान रखना चाहिए कि यह केवल एक अकादमिक सुझाव है। सरकारी स्तर पर फिलहाल किसी भी नए बैंक मर्जर का कोई रोडमैप या सक्रिय प्रस्ताव मौजूद नहीं है।
बैंकों की कार्यक्षमता (Efficiency) और डेटा
बीते एक दशक में सरकारी बैंकों ने अपने कामकाज में काफी सुधार किया है। रिपोर्ट के आंकड़ों पर नजर डालें तो फाइनेंशियल ईयर 2026 में पब्लिक सेक्टर बैंकों की तकनीकी दक्षता (Technical Efficiency) 93.12% तक पहुंच गई, जबकि प्राइवेट बैंकों की दक्षता 86.02% रही। यह बताता है कि साल 2017 से शुरू हुए सुधारों का असर कितना पॉजिटिव रहा है, जिसमें 27 बैंकों को घटाकर 12 बड़ी इकाइयों में बदल दिया गया था।
निवेशकों के लिए असली चुनौती: क्रेडिट-डिपॉजिट गैप
फिलहाल बैंकिंग सेक्टर के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्रेडिट और डिपॉजिट ग्रोथ का बढ़ता अंतर है। वर्तमान में क्रेडिट डिमांड करीब 19.3% की रफ्तार से बढ़ रही है, जबकि डिपॉजिट ग्रोथ मात्र 15.4% ही है।
यह असंतुलन बैंकों के लिए चिंता का विषय है क्योंकि:
- लिक्विडिटी की कमी हो सकती है।
- नेट इंटरेस्ट मार्जिन (NIM) पर दबाव बढ़ सकता है।
- बैंकों को लोन देने के लिए महंगे कर्ज पर निर्भर रहना पड़ सकता है, जो मुनाफे को कम करेगा।
आने वाले समय में निवेशकों को बैंकों की डिपॉजिट जुटाने की रणनीति और उनके क्रेडिट-डिपॉजिट रेशियो पर पैनी नजर रखनी चाहिए।
