दुबई के भारतीय निवेशक बदले इरादे: अब यूएस में लगा रहे हैं ₹5 मिलियन का 75% तक निवेश!

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AuthorNeha Patil|Published at:
दुबई के भारतीय निवेशक बदले इरादे: अब यूएस में लगा रहे हैं ₹5 मिलियन का 75% तक निवेश!

दुबई में रहने वाले अमीर भारतीय निवेशकों की निवेश की आदतों में बड़ा बदलाव आया है। पहले जो निवेशक अपने पोर्टफोलियो का सिर्फ **20-25%** भारत में लगाते थे, अब वे **50-75%** तक अमेरिकी बाजारों में निवेश कर रहे हैं। यह बड़ा फेरबदल यूएई की लॉन्ग-टर्म वीज़ा पॉलिसी और नई पीढ़ी के ग्लोबल निवेशकों की सोच का नतीजा है, जो अब भावनात्मक जुड़ाव से ज़्यादा बेहतर रिटर्न और डायवर्सिफिकेशन को महत्व दे रहे हैं।

Detailed Coverage

निवेश की बदली रणनीति

दुबई स्थित वेल्थ मैनेजमेंट फर्मों का कहना है कि पहले खाड़ी देशों में बसे भारतीय सालों तक पैसा कमाते थे, फिर उसे भारतीय बैंकों या प्रॉपर्टी में लगाते थे और रिटायरमेंट के बाद भारत लौटने की योजना बनाते थे। लेकिन अब यह सोच बदल गई है और वेल्थ मैनेजमेंट का नज़रिया ज़्यादा ग्लोबल हो गया है।

ग्लोबल एक्सपोजर पर फोकस

फर्मों के अनुसार, अब क्लाइंट्स के पोर्टफोलियो का 50% से 75% हिस्सा अमेरिका की ओर जा रहा है, जबकि भारतीय बाज़ारों के लिए केवल 20% से 25% ही बच रहा है। इससे पता चलता है कि प्रवासी भारतीय अब अपनी संपत्ति को ग्लोबल कैपिटल की तरह देख रहे हैं और उन एसेट क्लास पर ध्यान दे रहे हैं जो बेहतर रिस्क-एडजस्टेड रिटर्न या करेंसी स्टेबिलिटी देते हैं।

एक आम $5 मिलियन के पोर्टफोलियो में 60% फिक्स्ड-इनकम इंस्ट्रूमेंट्स और बाकी 40% ग्लोबल इक्विटी, डेरिवेटिव्स और कमोडिटी में बांटा जा रहा है। Nuvama Private और ASK Private Wealth जैसी कंपनियों ने इस मांग को पूरा करने के लिए अपनी सेवाएं बढ़ाई हैं।

वीज़ा पॉलिसी और नई पीढ़ी का असर

इस ट्रेंड के पीछे दो मुख्य कारण हैं। पहला, यूएई का गोल्डन वीज़ा प्रोग्राम, जिसने कई प्रोफेशनल्स को लॉन्ग-टर्म स्टेबिलिटी और परमानेंट रेसिडेंसी का भरोसा दिया है। अब वे खुद को सिर्फ प्रवासी नहीं, बल्कि यूएई के स्थायी निवासी मानते हैं, इसलिए वे अपनी कुल संपत्ति के लिए ज़्यादा स्थायी फैसले ले रहे हैं, जिसमें भारत से परे भी ग्रोथ देखना शामिल है।

दूसरा, खाड़ी में भारतीय निवेशकों की नई पीढ़ी अब पारिवारिक संपत्ति संभाल रही है। ये निवेशक ग्लोबल मार्केट से ज़्यादा सहज हैं और डेटा-आधारित रिटर्न को प्राथमिकता देते हैं। पिछली पीढ़ियों के विपरीत, जो भारतीय रियल एस्टेट या डोमेस्टिक इक्विटी को भावनात्मक रूप से पसंद करती थीं, ये नई पीढ़ी ग्लोबल लिक्विडिटी, टैक्स एफिशिएंसी और करेंसी कनवर्टिबिलिटी के आधार पर अवसरों का मूल्यांकन करती है। Anand Rathi जैसी फर्मों के बावजूद, इंडस्ट्री का झुकाव यूके, यूरोप और पूर्वी एशियाई बाजारों में एक्सपोजर वाले मल्टी-जियोग्राफी पोर्टफोलियो की ओर बढ़ रहा है।

निवेशकों को क्या देखना चाहिए?

पूंजी के इस बहाव का भारतीय निवेश पर लंबे समय में असर पड़ सकता है, खासकर रियल एस्टेट और लोकल इक्विटी फंड जैसे सेगमेंट में, जो पारंपरिक रूप से एनआरआई (NRI) पूंजी पर निर्भर रहे हैं। निवेशकों को यह देखना होगा कि क्या यह ट्रेंड GIFT City जैसे रेगुलेटेड चैनलों के ज़रिए भारत में भागीदारी बढ़ाता है, या फिर ज़्यादा से ज़्यादा निवेशकों के यूएई में लॉन्ग-टर्म वीज़ा हासिल करने के साथ अमेरिकी संपत्ति का दबदबा बढ़ता रहता है।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.