Dr. Reddy's के CEO Erez Israeli ने चेतावनी दी है कि अमेरिका द्वारा जेनेरिक दवाओं पर लगाए जाने वाले आयात शुल्क (tariffs) से अमेरिकी उपभोक्ताओं के लिए दवाओं की कीमतें बढ़ सकती हैं। फिलहाल, कंपनी के लिए अमेरिका में मैन्युफैक्चरिंग शिफ्ट करना लागत के लिहाज़ से संभव नहीं लग रहा है। ऐसे में, निवेशक अमेरिका की 2028 से लागू होने वाली टैरिफ नीतियों पर नज़र बनाए रख सकते हैं।
Detailed Coverage
टैरिफ नीति का पूरा प्लान
Dr. Reddy's Laboratories Ltd. अमेरिका के बाजार में नई ट्रेड पॉलिसी के कारण चुनौतियों का सामना कर सकती है। कंपनी के CEO Erez Israeli ने साफ किया है कि वे फिलहाल मैन्युफैक्चरिंग को अमेरिका शिफ्ट करने को एक व्यवहारिक बिजनेस स्ट्रैटेजी नहीं मानते। यह बात ऐसे समय आई है जब अमेरिका की नई नीतियों के तहत आने वाले सालों में इम्पोर्टेड जेनेरिक दवाओं पर भारी टैरिफ लगाए जाने की योजना है।
अमेरिकी प्रशासन की योजना के मुताबिक, 1 अगस्त 2026 से दो साल के लिए इम्पोर्टेड जेनेरिक दवाओं पर कोई टैरिफ नहीं लगेगा। लेकिन, इसके बाद यह पॉलिसी बदलने वाली है। घोषणा के अनुसार, अगस्त 2028 से 100% टैरिफ लागू होगा, और आने वाले सालों में यह बढ़कर 200% तक पहुंच सकता है। Israeli ने कहा कि कंपनी इन डेवलपमेंट पर बारीकी से नज़र रख रही है, लेकिन अभी तक अपनी ऑपरेशनल स्ट्रैटेजी में कोई बदलाव नहीं किया है। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर ये टैरिफ लागू होते हैं, तो बढ़ी हुई लागत सप्लाई चेन से होते हुए अमेरिकी मरीजों के लिए दवाओं की खुदरा कीमतों (retail prices) को बढ़ा सकती है।
मैन्युफैक्चरिंग कॉस्ट और भविष्य की प्लानिंग
टैरिफ से बचने के लिए प्रोडक्शन को अमेरिका शिफ्ट करने की संभावना पर कंपनी के मैनेजमेंट ने बताया कि अमेरिका में मैन्युफैक्चरिंग की लागत, भारत जैसी जगहों की तुलना में काफी ज़्यादा है। Dr. Reddy's का बड़ा हिस्सा प्रोडक्शन भारत में होता है। CEO ने यह भी कन्फर्म किया कि कंपनी पार्टनरशिप या कॉन्ट्रैक्ट मैन्युफैक्चरिंग के अवसरों के लिए तैयार है, अगर वे बिजनेस के लिए फायदेमंद हों। लेकिन, मौजूदा कॉस्ट स्ट्रक्चर को देखते हुए प्रोडक्शन को पूरी तरह से अमेरिका शिफ्ट करना फिलहाल प्रैक्टिकल नहीं है।
भारतीय फार्मा एक्सपोर्टर्स के लिए अहम
यह डेवलपमेंट भारतीय फार्मा सेक्टर के लिए काफी मायने रखता है, क्योंकि भारत अमेरिका को जेनेरिक दवाओं का सबसे बड़ा सप्लायर है। अगर इम्पोर्ट पर रोक लगाने वाली कोई भी पॉलिसी आती है, तो यह भारतीय एक्सपोर्टर्स के प्रॉफिट मार्जिन और मार्केट एक्सेस को खतरे में डाल सकती है। निवेशकों को यह देखना होगा कि ये कंपनियां सप्लाई चेन में संभावित बदलावों को कैसे मैनेज करती हैं और क्या वे बिना मार्केट शेयर खोए बढ़ी हुई लागत को ग्राहकों पर डाल पाती हैं। इन कंपनियों का लॉन्ग-टर्म फाइनेंशियल हेल्थ इन संभावित ट्रेड बैरियर्स से निपटने और ग्लोबल मार्केट में अपनी कॉम्पिटिटिव कॉस्ट एडवांटेज बनाए रखने की क्षमता पर निर्भर करेगा।
