डिजिटल नॉन-बैंकिंग लेंडर्स (NBFCs) ने अब छोटे लोन के बजाय बड़े टिकट साइज वाले लोन पर फोकस बढ़ा दिया है, जिससे उनका लोन बुक **₹1.54 लाख करोड़** तक पहुंच गया है। हालांकि, यह कदम जोखिम भरे ग्राहकों और युवाओं की ओर झुकाव के साथ आता है, जो निवेशकों के लिए एसेट क्वालिटी पर नजर रखने का एक बड़ा संकेत है।
भारत में डिजिटल-फर्स्ट नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनियों (NBFCs) की रणनीति में बड़ा बदलाव दिख रहा है। ये कंपनियां अब छोटी अवधि के लोन के बजाय बड़े पर्सनल लोन पर ध्यान केंद्रित कर रही हैं। जून 2026 के अंत तक, इन डिजिटल लेंडर्स का आउटस्टैंडिंग पोर्टफोलियो 28% बढ़कर ₹1,54,195 करोड़ हो गया है, जो पिछले साल ₹1,20,122 करोड़ था। गौर करने वाली बात यह है कि यह वृद्धि तब हुई है जब कुल खातों की संख्या घटकर 5.64 करोड़ रह गई है, यानी लेंडर्स अब कम ग्राहकों को बड़ी राशि का कर्ज दे रहे हैं।
प्रति ग्राहक बढ़ रहा कर्ज
प्रति ग्राहक औसत बकाया राशि लगभग 30% बढ़कर ₹27,350 हो गई है। इसका मतलब है कि डिजिटल लेंडर्स अब नए छोटे ग्राहकों के पीछे भागने के बजाय अपने मौजूदा ग्राहकों से ज्यादा वैल्यू निकालने की कोशिश कर रहे हैं। जून तिमाही में ही, इन कंपनियों ने ₹64,656 करोड़ के नए लोन स्वीकृत किए, जो पिछले साल के मुकाबले 50% की उछाल है। इसमें 60% हिस्सा उन लोन का है, जो ₹50,000 से ज्यादा के हैं।
बढ़ता जोखिम और RBI की नजर
यह रणनीति आंकड़ों को तो बेहतर दिखा रही है, लेकिन इसके साथ नया रिस्क भी आया है। डिजिटल लेंडर्स अब उन ग्राहकों को कर्ज दे रहे हैं जिनसे पारंपरिक बैंक दूरी बनाए रखते हैं। डेटा के मुताबिक, इन NBFCs द्वारा दिए गए कुल लोन का 29% हिस्सा उन लोगों को मिला है जिनका क्रेडिट रिस्क बहुत अधिक है, जबकि पारंपरिक बैंकों में यह आंकड़ा सिर्फ 9% है।
RBI ने पहले ही अनसिक्योर्ड रिटेल क्रेडिट पर चिंता जताई है और 'रिस्क वेट' (Risk Weights) को बढ़ा दिया है, जिससे लेंडर्स को ज्यादा कैपिटल रिजर्व में रखना पड़ता है। हालांकि 90 से 180 दिन तक ओवरड्यू रहने वाले लोन की दर 2.5% से घटकर 1.4% हुई है, लेकिन असली परीक्षा तब होगी जब अर्थव्यवस्था में सुस्ती आएगी। निवेशकों को आगामी तिमाहियों में इनकी एसेट क्वालिटी पर बारीक नजर रखनी होगी, क्योंकि टियर-3 शहरों में विस्तार और जोखिम भरे ग्राहकों पर दांव का असर जल्द ही सामने आ सकता है।
