डिजिटल NBFCs ने फाइनेंशियल ईयर 2026-27 की पहली तिमाही में **3.4 करोड़** पर्सनल लोन बांटे हैं। छोटे शहरों और युवाओं के बीच बढ़ती मांग से यह सेक्टर तेजी से फैल रहा है, लेकिन निवेशकों को लोन की असुरक्षित प्रकृति और रेगुलेटरी सख्ती पर भी नजर रखनी होगी।
भारत के डिजिटल लेंडिंग बाजार में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। फाइनेंशियल ईयर 2026-27 की पहली तिमाही में डिजिटल NBFCs ने कुल 3.4 करोड़ लोन प्रोसेस किए, जिसकी कुल वैल्यू ₹64,656 करोड़ रही। जून 2026 तक इन प्लेटफॉर्म्स का कुल आउटस्टैंडिंग लोन पोर्टफोलियो ₹1.54 लाख करोड़ के स्तर पर पहुंच गया है।
छोटे शहरों और युवाओं पर फोकस
इस ग्रोथ के पीछे सबसे बड़ा हाथ 35 साल से कम उम्र के युवाओं का है, जिनका कुल लोन में 58% हिस्सा है। वहीं, टियर-3 शहरों और ग्रामीण इलाकों में लेंडिंग एक्टिविटी में 58% का जबरदस्त उछाल आया है। यह साफ दर्शाता है कि डिजिटल लेंडर्स उन ग्राहकों तक पहुंच रहे हैं, जो अब तक बैंकिंग सिस्टम से दूर थे।
स्मॉल-टिकट लेंडिंग मॉडल
पारंपरिक बैंकों के मुकाबले इन कंपनियों का मॉडल एकदम अलग है। जहां बैंकों का औसत पर्सनल लोन ₹4.52 लाख होता है, वहीं इन डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर औसत लोन साइज मात्र ₹18,802 है। ये कंपनियां 578 से 644 के क्रेडिट स्कोर वाले मध्यम-जोखिम (medium-risk) ग्राहकों को टारगेट कर रही हैं।
निवेश के जोखिम और ध्यान रखने वाली बातें
बिना कोलैटरल (collateral) वाली असुरक्षित लेंडिंग में ग्रोथ तो है, लेकिन इसमें रिस्क भी छिपा है। फिलहाल 90 दिन से अधिक की ओवरड्यू दर 1.4% है, जो अभी नियंत्रण में है। हालांकि, रेगुलेटरी अथॉरिटीज अब डेटा प्राइवेसी और पारदर्शिता को लेकर काफी सख्त हो रही हैं। निवेशकों को आने वाले समय में इन कंपनियों के फंडिंग कॉस्ट, एसेट क्वालिटी और रेगुलेटरी एनवायरनमेंट पर पैनी नजर रखने की जरूरत है।
