Bain & Company और NPCI Bharat BillPay की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत के MSME सेक्टर में **₹60 लाख करोड़** की क्रेडिट गैप (Credit Gap) है। इसे दूर करने के लिए एक सेंट्रलाइज्ड डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर प्रस्तावित किया गया है, जो कैश-फ्लो आधारित लेंडिंग को आसान बनाएगा।
क्रेडिट की कमी का संकट
भारत का MSME सेक्टर इस समय ₹60 लाख करोड़ के औपचारिक क्रेडिट गैप से जूझ रहा है। मौजूदा समय में, बैंकों और संस्थागत स्रोतों से MSMEs की कुल कर्ज मांग का सिर्फ 30% से 40% ही पूरा हो पाता है। इसकी मुख्य वजह है रियल-टाइम फाइनेंशियल डेटा की कमी, जिसके चलते उधारदाताओं को फिजिकल कोलैटरल (Physical Collateral) पर निर्भर रहना पड़ता है। इसके अलावा, करीब ₹8 लाख करोड़ के पेमेंट्स इनवॉइस और डेटा मिसमैच के कारण अटके हुए हैं।
कैसे काम करेगा नया डिजिटल सिस्टम?
प्रस्तावित डिजिटल लेयर का लक्ष्य इनवॉइस, पेमेंट, बैंकों और फाइनेंसरों को एक साथ एक प्लेटफॉर्म पर लाना है। हर महीने जनरेट होने वाले 20 करोड़ से ज्यादा GST ई-इनवॉइस का डेटा इस सिस्टम के लिए एक बड़ी ताकत साबित हो सकता है। यह तकनीक बैंकों को 'कोलैटरल-बेस्ड' लेंडिंग के बजाय 'कैश-फ्लो-बेस्ड' अंडरराइटिंग की ओर शिफ्ट करने में मदद करेगी।
निवेशकों और सेक्टर के लिए मायने
यह कदम बैंकों, NBFCs, फिनटेक (Fintech) और सॉफ्टवेयर प्रोवाइडर्स के लिए बड़ा अवसर पैदा कर सकता है। चूँकि MSME सेक्टर भारत के ग्रॉस वैल्यू एडेड (GVA) में करीब 45% का योगदान देता है, इसलिए इस डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर से वर्किंग कैपिटल की दक्षता में बड़ा सुधार आ सकता है।
क्या हैं चुनौतियां?
इतने बड़े स्तर पर सिस्टम को लागू करने में एग्जीक्यूशन में देरी का रिस्क बना हुआ है। इसके साथ ही, डेटा सुरक्षा और साइबर सिक्योरिटी (Cybersecurity) भी बड़ी चिंताएं हैं। छोटे व्यवसायों द्वारा इस नए सिस्टम को अपनाने की गति और रेगुलेटरी फ्रेमवर्क का स्टैंडडाइजेशन ही इस पूरी पहल की सफलता तय करेगा।
