अनुभवी बैंकर दीपक पारेख ने सरकार से सरकारी बैंकों (PSU Banks) के कंसॉलिडेशन (Consolidation) को आगे बढ़ाने और बैंकों में विदेशी निवेश (FDI) की सीमा को और बढ़ाने का आग्रह किया है। इंडिया मर्चेंट्स चैंबर की सालाना बैठक में बोलते हुए उन्होंने भारत के कॉर्पोरेट बॉन्ड मार्केट को दोगुना करने और हाउसिंग सेक्टर में सप्लाई की कमी को दूर करने की ज़रूरत पर भी ज़ोर दिया।
क्या कहा दीपक पारेख ने?
एचडीएफसी (HDFC) के पूर्व चेयरमैन और दिग्गज बैंकर दीपक पारेख ने भारत के बैंकिंग और वित्तीय सेक्टर में बड़े स्ट्रक्चरल बदलावों का प्रस्ताव रखा है। इंडिया मर्चेंट्स चैंबर (IMC) की सालाना आम बैठक में उन्होंने कहा कि सरकार को सरकारी बैंकों (PSUs) के कंसॉलिडेशन पर ध्यान देना चाहिए ताकि कम, लेकिन ज़्यादा मज़बूत बैंक बनाए जा सकें। उन्होंने बैंकों, चाहे वे सरकारी हों या प्राइवेट, में फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट (FDI) की लिमिट बढ़ाने का भी सुझाव दिया ताकि ज़्यादा विदेशी पूंजी आकर्षित की जा सके।
पारेख ने यह भी कहा कि ऐसे सुधारों का सही समय तब होता है जब बैंकिंग सेक्टर मज़बूत स्थिति में हो, न कि किसी संकट के दौरान। यह सलाह ऐसे समय में आई है जब भारत अपने लंबे समय के ग्रोथ और रोज़गार के लक्ष्यों को पूरा करने की कोशिश कर रहा है।
कंसॉलिडेशन और FDI लिमिट क्यों ज़रूरी?
सरकारी बैंकों के कंसॉलिडेशन की मांग का मक़सद बैंकों को ज़्यादा मज़बूत बैलेंस शीट और बेहतर ऑपरेशनल एफिशिएंसी देना है। जब छोटे बैंक आपस में मिलते हैं, तो वे ओवरलैपिंग खर्चों को कम कर सकते हैं और बड़े लोन देने की अपनी क्षमता में सुधार कर सकते हैं। हालांकि, निवेशकों को यह ध्यान रखना चाहिए कि पिछले मर्ज़रों में इंटीग्रेशन की चुनौतियां भी देखी गई हैं, जैसे कि अलग-अलग वर्क कल्चर और टेक्नोलॉजी सिस्टम को मिलाना।
FDI लिमिट बढ़ाने के मामले में, पारेख का तर्क है कि इससे नई पूंजी आएगी जो बैंकों की कैपिटल बफ़र को मज़बूत करेगी। फिलहाल, प्राइवेट बैंकों में FDI की लिमिट 74% है, जबकि सरकारी बैंकों के लिए यह लिमिट सरकारी रूट से 20% है। इन लिमिट्स में किसी भी बदलाव के लिए रेगुलेटर्स द्वारा बड़े पॉलिसी बदलावों की ज़रूरत होगी।
कॉर्पोरेट डेट मार्केट को बढ़ाने की ज़रूरत
पारेख ने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि भारत का कॉर्पोरेट बॉन्ड मार्केट (Corporate Bond Market) इकॉनमी के आकार की तुलना में अभी भी अविकसित है। वर्तमान में, यह मार्केट देश की जीडीपी (GDP) का लगभग 18% है। उन्होंने कहा कि देश की भारी निवेश ज़रूरतों को पूरा करने के लिए इस मार्केट को दोगुना करने की ज़रूरत है।
डेट मार्केट का विस्तार निवेशकों के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह कंपनियों को पारंपरिक बैंकिंग सिस्टम के बाहर से पैसा उधार लेने का एक तरीका देता है। इससे बैंकों का जोखिम कम होता है और कंपनियों को उनके विकास के लिए फंड करने के ज़्यादा विकल्प मिलते हैं। पारेख ने सुझाव दिया कि क्रॉस-बॉर्डर सिक्योरिटाइजेशन (Cross-border securitization) और क्रेडिट मैकेनिज़्म (Credit mechanisms) को मज़बूत करने जैसे कदम म्युनिसिपल और कॉर्पोरेट बॉन्ड मार्केट को बढ़ावा दे सकते हैं।
मार्केट की मजबूती और रिटेल निवेशकों का भरोसा
हाल की अस्थिरता और पिछले 18 महीनों में फॉरेन पोर्टफोलियो इन्वेस्टर्स (FPIs) द्वारा लगभग $50 बिलियन की बिकवाली के बावजूद, पारेख ने बताया कि घरेलू मार्केट मज़बूत बना हुआ है। उन्होंने इस मजबूती का श्रेय बड़े पैमाने पर डोमेस्टिक इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स (Domestic Institutional Investors) को दिया, खासकर रिटेल सिस्टेमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान्स (SIPs) से होने वाले लगभग ₹30,000 करोड़ के लगातार मासिक इनफ्लो को। भारतीय परिवारों से पैसे के इस नियमित प्रवाह ने विदेशी बिकवाली के ख़िलाफ़ एक कुशन प्रदान किया है, जिससे मार्केट को स्थिर बनाए रखने में मदद मिली है।
हाउसिंग और रोज़गार में चुनौतियां
हाउसिंग सेक्टर के मोर्चे पर, पारेख ने सप्लाई-डिमांड गैप (Supply-Demand Gap) को उजागर किया। उन्होंने बताया कि अगले पांच वर्षों में 30 मिलियन यूनिट्स की अनुमानित कमी है, जबकि वर्तमान सप्लाई केवल लगभग 600,000 यूनिट्स प्रति वर्ष है। इसके अलावा, उन्होंने यह भी कहा कि नई सप्लाई का बड़ा हिस्सा लग्ज़री हाउसिंग (Luxury Housing) की ओर झुका हुआ है, जिससे किफायती घरों (Affordable Homes) में कमी है। रियल एस्टेट सेक्टर पर नज़र रखने वाले निवेशकों को यह देखना चाहिए कि कंपनियां इस सप्लाई और डिमांड के असंतुलन को कैसे दूर करती हैं।
अंत में, उन्होंने रोज़गार सृजन (Job Creation) और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के उदय से संबंधित चिंताओं को संबोधित किया। पारेख का मानना है कि AI, आईटी सेवाओं (IT Services) के लिए एक खतरा नहीं, बल्कि एक अवसर है। लेकिन उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि भारत को अपनी ग्रोथ की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए सालाना 10 मिलियन नौकरियां पैदा करनी होंगी।
