भारतीय डेट म्यूचुअल फंडों (Debt Mutual Funds) के निवेश पोर्टफोलियो में बड़ा बदलाव आया है। अब बैंक सर्टिफिकेट ऑफ डिपॉजिट (CDs) सबसे बड़ी होल्डिंग बन गई हैं, जबकि सरकारी सिक्योरिटीज (G-Secs) का महत्व कम हो गया है। मार्च 2026 तक, CDs का हिस्सा बढ़कर **25%** हो गया है।
डेट फंड्स में क्यों हो रहा है ये बड़ा बदलाव?
भारतीय डेट म्यूचुअल फंडों (Debt Mutual Funds) के निवेश पोर्टफोलियो में एक बड़ा बदलाव देखने को मिला है। अब बैंक सर्टिफिकेट ऑफ डिपॉजिट (CDs) फंडों की सबसे बड़ी होल्डिंग बन गई हैं। सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया (SEBI) के आंकड़ों के अनुसार, मार्च 2026 तक, डेट फंड्स की कुल संपत्ति में CDs का हिस्सा बढ़कर 25% तक पहुंच गया है। यह आंकड़ा मार्च 2024 में केवल 15.9% था। वहीं, जो सरकारी सिक्योरिटीज (G-Secs) पहले सबसे पसंदीदा एसेट क्लास हुआ करती थीं, उनका हिस्सा घटकर 14% रह गया है, जो मार्च 2024 में 21.7% था।
टैक्स नियमों में बदलाव का बड़ा असर
इस बड़े फेरबदल की मुख्य वजह 2023 में डेट फंड्स के टैक्स नियमों में किए गए बदलाव हैं। नए नियमों के तहत, अब डेट फंड्स में निवेश पर निवेशकों को इंडेक्सेशन लाभ के साथ कम लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन्स टैक्स दर के बजाय, अपनी व्यक्तिगत इनकम टैक्स स्लैब के हिसाब से टैक्स देना पड़ता है। इस बदलाव ने खासकर लंबी अवधि वाली स्कीम्स, जैसे कि गिल्ट फंड्स (Gilt Funds) को कम आकर्षक बना दिया है, क्योंकि ये फंड्स लंबी मैच्योरिटी वाली सरकारी बॉन्ड्स में निवेश करते हैं।
शॉर्ट-टर्म स्कीम्स की ओर बढ़ता निवेश
इस वजह से, निवेशकों का रुझान छोटी अवधि वाली स्कीम्स, जैसे मनी मार्केट फंड्स (Money Market Funds) की ओर बढ़ा है। ये फंड्स CDs और कमर्शियल पेपर्स (Commercial Papers) जैसे लिक्विड इंस्ट्रूमेंट्स में निवेश करते हैं। इस बदलाव का सीधा असर फंड फ्लो पर दिख रहा है। मनी मार्केट फंड्स में 2025-26 के फाइनेंशियल ईयर में ₹59,478 करोड़ का इनफ्लो (Inflow) दर्ज किया गया। इसके विपरीत, गिल्ट फंड्स, जो सरकारी बॉन्ड्स पर फोकस करते हैं, से निवेशकों ने ₹7,799 करोड़ निकाल लिए।
कॉर्पोरेट डेट में भी बढ़ी रुचि
CDs के अलावा, कॉर्पोरेट डेट (Corporate Debt) में भी फंड मैनेजर्स की दिलचस्पी बढ़ी है। पिछले दो सालों में, म्यूचुअल फंड पोर्टफोलियो में कॉर्पोरेट डेट का हिस्सा 15.2% से बढ़कर 17% हो गया है। इससे पता चलता है कि फंड मैनेजर्स इन फंड्स के टैक्स-न्यूट्रल या टैक्स-इनएफिशिएंट होने की भरपाई के लिए कॉर्पोरेट सेक्टर में बेहतर यील्ड (Yield) की तलाश कर रहे हैं।
निवेशकों के लिए क्या हैं मायने?
निवेशकों के लिए यह एसेट एलोकेशन (Asset Allocation) में बदलाव नई चुनौतियां लेकर आया है। जहां CDs को बैंकों द्वारा जारी किए गए सुरक्षित, शॉर्ट-टर्म इंस्ट्रूमेंट्स माना जाता है, वहीं इनमें सॉवरेन-बैक्ड G-Secs की तुलना में अलग जोखिम हो सकते हैं। बाजार में अत्यधिक तनाव की स्थिति में, लिक्विडिटी (Liquidity) यानी किसी एसेट को उसकी कीमत पर असर डाले बिना तुरंत बेचने की क्षमता, शॉर्ट-टर्म मार्केट्स में एक चुनौती बन सकती है। साथ ही, ये फंड्स अब शॉर्ट ड्यूरेशन पर ज्यादा केंद्रित हैं, इसलिए ये लॉन्ग-टर्म बॉन्ड फंड्स की तुलना में इंटरेस्ट रेट में होने वाले बदलावों के प्रति कम संवेदनशील हैं। हालांकि, ये सेंट्रल बैंक की नीतियों और समग्र बाजार लिक्विडिटी की स्थिति में होने वाले बदलावों के प्रति संवेदनशील बने रहेंगे।
आगे निवेशकों के लिए यह देखना अहम होगा कि क्या यह ट्रेंड जारी रहता है या इंटरेस्ट रेट साइकल्स में बदलाव लंबी अवधि के सरकारी बॉन्ड्स की ओर वापसी को प्रोत्साहित करता है। फंड मैनेजर्स को टैक्स-एडजस्टेड माहौल में सुरक्षा की जरूरत और रिटर्न की तलाश के बीच संतुलन कैसे बनाते हैं, इस पर भी नजर रखनी होगी।
