टाटा ग्रुप में एक बड़ा बदलाव सामने आया है। सीनियर एडवोकेट Darius Khambata ने **9 नवंबर, 2026** से Tata Trusts के ट्रस्टी के तौर पर दोबारा काम करने से साफ इनकार कर दिया है। उन्होंने N Chandrasekaran के कार्यकाल को बढ़ाने के फैसले पर गंभीर असहमति जताई है, जिससे लीडरशिप के अंदर मतभेद साफ झलक रहे हैं।
गवर्नेंस को लेकर खटपट
वरिष्ठ वकील Darius Khambata ने Sir Dorabji Tata Trust और Sir Ratan Tata Trust के ट्रस्टी के तौर पर अपना कार्यकाल आगे न बढ़ाने का फैसला किया है। यह फैसला 17 सितंबर, 2026 को हुई Tata Sons की बोर्ड मीटिंग के बाद आया है, जिसमें N Chandrasekaran को चेयरमैन के तौर पर 5 साल का और विस्तार देने का प्रस्ताव पारित किया गया था। Khambata ने इस मीटिंग की कार्यप्रणाली पर कड़े सवाल उठाते हुए इसे बेहद दुर्भाग्यपूर्ण बताया है।
Noel Tata ने भी उठाए सवाल
इस आंतरिक कलह में केवल Khambata ही नहीं, बल्कि Tata Trusts के चेयरमैन Noel Tata ने भी अपनी आवाज बुलंद की है। उन्होंने Chandrasekaran की पुनर्नियुक्ति की प्रक्रिया को चुनौती दी है और इसे कंपनी के आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन का उल्लंघन बताया है। टाटा ग्रुप के मुख्य होल्डिंग स्ट्रक्चर और ट्रस्ट के बीच यह टकराव निवेशकों के लिए चिंता का विषय बनता जा रहा है।
RBI के नियमों पर नजर
Tata Sons को Reserve Bank of India (RBI) द्वारा 'अपर लेयर NBFC' के रूप में वर्गीकृत किया गया है, जिसके कारण कंपनी पर कड़े अनुपालन (compliance) और पारदर्शिता के नियम लागू होते हैं। Khambata ने केंद्रीय बैंक के साथ ट्रस्ट के जुड़ाव और Tata Sons की संभावित लिस्टिंग को लेकर भी अपना पुराना विरोध दर्ज कराया है। फिलहाल, बाजार की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि कंपनी इस गवर्नेंस क्राइसिस और लीगल चुनौतियों से कैसे पार पाती है, क्योंकि भविष्य की रणनीतिक दिशा अब इन्हीं फैसलों पर निर्भर करेगी।
