महामारी के दौरान बाजार में आए रिटेल निवेशकों का रुझान अब बदल रहा है। DIY ट्रेडिंग की मुश्किलों और मार्केट में जारी उतार-चढ़ाव के कारण निवेशक अब अपने बिखरे हुए पोर्टफोलियो को मैनेज करने के लिए प्रोफेशनल फर्मों की मदद ले रहे हैं।
पोर्टफोलियो का बोझ और बढ़ती जटिलता
भारतीय शेयर बाजार में एक नया ट्रेंड देखने को मिल रहा है। पेंडेमिक के दौरान शेयर बाजार में कदम रखने वाले कई रिटेल निवेशक अब 'डू-इट-योरसेल्फ' (DIY) यानी खुद ट्रेडिंग करने के मॉडल से दूरी बना रहे हैं। असल में, इनके पास स्टॉक्स का एक ऐसा बड़ा और बिखरा हुआ पोर्टफोलियो जमा हो गया है, जिसे ट्रैक करना या सही समय पर एग्जिट करना मुश्किल हो रहा है। ऐसे में बाजार के वोलेटिलिटी भरे माहौल में निवेशक अब प्रोफेशनल एक्सपर्ट्स की तलाश कर रहे हैं।
टेक्नोलॉजी का बढ़ता दखल
Dezerv जैसी वेल्थ मैनेजमेंट कंपनियां इस बदलाव में बड़ी भूमिका निभा रही हैं। ये कंपनियां टेक-इनेबल्ड प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल कर रही हैं, जिससे पोर्टफोलियो एनालिटिक्स और ट्रेड को ऑटोमेट करना आसान हो गया है। लगभग ₹20,000 करोड़ के एसेट्स को मैनेज करने वाली ये फर्म्स कम प्रदर्शन करने वाले एसेट्स की पहचान कर निवेशकों के पोर्टफोलियो को व्यवस्थित करने में मदद कर रही हैं।
क्यों जरूरी है एक्सपर्ट की सलाह?
रिटायरमेंट प्लानिंग अब और भी चुनौतीपूर्ण हो गई है। भारत में हेल्थकेयर इंफ्लेशन 15% की दर से बढ़ रही है, जिसका मतलब है कि कुछ साल पहले बनाए गए रिटायरमेंट गोल्स अब कम पड़ सकते हैं। फाइनेंशियल एक्सपर्ट्स का कहना है कि बढ़ती उम्र और महंगे लाइफस्टाइल के कारण अब जल्दी प्लानिंग करना जरूरी है।
सतर्क रहना भी जरूरी
प्रोफेशनल मैनेजमेंट का मतलब मुनाफा नहीं है। पोर्टफोलियो मैनेजमेंट सर्विसेज (PMS) में आम तौर पर 1% से 2% तक मैनेजमेंट फीस ली जाती है, जो आपके नेट रिटर्न पर असर डाल सकती है। इसके अलावा, Dezerv की 'मोमेंटम' स्ट्रेटजी जैसे उदाहरण बताते हैं कि 2024-25 के दौरान इसमें नुकसान भी हुआ है। इसलिए, किसी भी सर्विस को चुनने से पहले उसकी फीस, ट्रैक रिकॉर्ड और रिस्क फैक्टर को अच्छी तरह से समझना बेहद जरूरी है।
