घरेलू संस्थागत निवेशकों (DIIs) ने 7 अगस्त 2026 तक भारतीय इक्विटी में नेट **₹5.13 ट्रिलियन** डाले हैं। यह लगातार तीसरा साल है जब इनफ्लो **₹5 ट्रिलियन** के पार गया है। इसने विदेशी निवेशकों की बिकवाली के मुकाबले एक मजबूत सहारा दिया है, जो भारतीय बाज़ार में घरेलू मांग के बढ़ते महत्व को दर्शाता है।
डोमेस्टिक इन्वेस्टर्स का रिकॉर्ड तोड़ प्रदर्शन!
घरेलू संस्थागत निवेशकों (DIIs) ने 2026 में एक बड़ा मुकाम हासिल किया है। 7 अगस्त 2026 तक, उन्होंने कैलेंडर वर्ष के लिए इक्विटी में ₹5.13 ट्रिलियन का नेट निवेश दर्ज किया है। यह लगातार तीसरा साल है जब घरेलू निवेश ₹5 ट्रिलियन के आंकड़े को पार कर गया है, जो भारतीय वित्तीय बाज़ार में डोमेस्टिक कैपिटल के बढ़ते दबदबे का संकेत है।
बाज़ार को मिल रहा है घरेलू सहारा
यह लगातार खरीददारी बाज़ार में स्थिरता के लिए बेहद अहम है। पिछले तीन सालों में, विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) ने भारतीय शेयरों से लगभग ₹10 ट्रिलियन की निकासी की है। पहले, विदेशी निवेशकों की इतनी बड़ी बिकवाली से बाज़ार में भारी गिरावट आ सकती थी। लेकिन आज, घरेलू पूंजी का यह स्थिर प्रवाह एक मज़बूत दीवार की तरह काम कर रहा है। यह बिकवाली के दबाव को झेल रहा है और वैश्विक अनिश्चितताओं के बावजूद बाज़ार को स्थिर रखने में मदद कर रहा है।
शेयर होल्डिंग में बड़ा बदलाव
इस बदलाव का असर शेयर होल्डिंग के आंकड़ों में भी साफ दिख रहा है। Nifty 500 इंडेक्स में, DII की हिस्सेदारी जून 2026 तक बढ़कर रिकॉर्ड 21% हो गई है, जिससे कई सेगमेंट में विदेशी निवेशकों का प्रभाव कम हो गया है। इसका मतलब है कि अब कई बड़ी भारतीय कंपनियों की दिशा डोमेस्टिक मनी से तय हो रही है, न कि अस्थिर ग्लोबल फ्लोज़ से।
आगे क्या हैं बाज़ार के जोखिम?
यह तेज़ी बाज़ार की परिपक्वता का सकारात्मक संकेत है, लेकिन निवेशकों को कुछ जोखिमों पर भी ध्यान देना चाहिए। कुछ बाज़ार विश्लेषकों ने वैल्युएशन को लेकर चिंता जताई है। उनका कहना है कि भारतीय बाज़ार अपने ऐतिहासिक स्तरों की तुलना में महंगे दिख रहे हैं। इसके अलावा, बाज़ार अब रिटेल सिस्टेमेटिक इन्वेस्टमेंट प्लान्स (SIPs) की निरंतरता पर बहुत अधिक निर्भर है। ये छोटे, नियमित निवेश DII की वृद्धि के पीछे की मुख्य शक्ति रहे हैं। अगर बाज़ार के खराब प्रदर्शन या आर्थिक दबाव के कारण रिटेल निवेशकों का भरोसा कम होता है, तो DIIs द्वारा प्रदान किया जा रहा सहारा एक बड़ी चुनौती का सामना कर सकता है।
DIIs की सेक्टर चॉइस
अपने पोर्टफोलियो में, DIIs ने कंज्यूमर, PSU बैंक्स, ऑयल & गैस और टेक्नोलॉजी जैसे सेक्टर्स को प्राथमिकता दी है। इसके विपरीत, उन्होंने प्राइवेट बैंक्स, NBFCs और केमिकल्स जैसे सेक्टर्स में सतर्क या कम वेटेज बनाए रखा है। यह दर्शाता है कि फंड मैनेजर चुनिंदा जगहों पर ही पैसा लगा रहे हैं।
निवेशकों को इन बातों पर नज़र रखनी होगी
आगे बढ़ते हुए, निवेशकों को दो मुख्य कारकों पर नज़र रखनी चाहिए। पहला, मंथली SIP इनफ्लो की निरंतरता, जो इन निवेशों का मुख्य ईंधन है। दूसरा, FPIs की वापसी की संभावना। हाल के हफ्तों में विदेशी फ्लोज़ के सकारात्मक होने के संकेत मिले हैं। ऐसे में, बाज़ार का समीकरण घरेलू खरीदारों और विदेशी विक्रेताओं के बीच की खींचतान से बदलकर एक ऐसी स्थिति में आ सकता है जहाँ दोनों पक्ष एक साथ खरीददारी कर सकते हैं। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि अगर ग्लोबल ब्याज दरें या भू-राजनीतिक स्थितियां कसती हैं, तो क्या यह डोमेस्टिक खरीददारी की तीव्रता जारी रहेगी।
