DICGC Insurance Premiums: आखिर क्यों कमर्शियल बैंकों पर पड़ रहा है प्रीमियम का भारी बोझ?

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AuthorNeha Patil|Published at:
DICGC Insurance Premiums: आखिर क्यों कमर्शियल बैंकों पर पड़ रहा है प्रीमियम का भारी बोझ?

DICGC इंश्योरेंस प्रीमियम का अधिकांश हिस्सा कमर्शियल बैंक भर रहे हैं, जबकि दावों (Claims) के मामले में कोऑपरेटिव बैंक काफी आगे हैं। नई रिस्क-बेस्ड संरचना के बावजूद, बेहतरीन प्रदर्शन करने वाले कमर्शियल बैंकों के लिए यह एक बड़ा वित्तीय बोझ बना हुआ है, जिसका सीधा असर उनके मार्जिन पर पड़ रहा है।

प्रीमियम और दावों का बड़ा अंतर

साल 1962 में डिपॉजिट इंश्योरेंस प्रोग्राम की शुरुआत के बाद से कमर्शियल और कोऑपरेटिव बैंकों के रिस्क प्रोफाइल में जमीन-आसमान का अंतर देखा गया है। डेटा के मुताबिक, इस पूरी अवधि में कमर्शियल बैंकों ने केवल ₹135.15 करोड़ के नेट क्लेम किए हैं। इसके विपरीत, कोऑपरेटिव बैंकिंग सेक्टर के नेट क्लेम ₹9,835.39 करोड़ रहे हैं। इसके बावजूद, DICGC के कुल प्रीमियम पूल में कमर्शियल बैंकों का योगदान लगभग 95% है।

इस स्थिति का मतलब यह है कि मजबूत और स्टेबल कमर्शियल बैंक असल में कोऑपरेटिव संस्थानों के रिस्क की भरपाई कर रहे हैं। मार्च 2025 तक डिपॉजिट इंश्योरेंस फंड में ₹2,28,933 करोड़ से ज्यादा की राशि जमा हो चुकी है, जो यह बताती है कि प्रीमियम कलेक्शन वास्तविक जरूरत से कहीं ज्यादा है।

अप्रैल 2026 के रिफॉर्म्स का असर

DICGC ने 1 अप्रैल 2026 से एक रिस्क-बेस्ड प्रीमियम मॉडल लागू किया है, जिसके तहत कैटेगरी A वाले टॉप-रेटेड बैंकों को 33% तक का डिस्काउंट मिल सकता है। हालांकि, एनालिसिस यह बताती है कि इस छूट के बाद भी ये बैंक अपने रिस्क इतिहास के मुकाबले लगभग दोगुना प्रीमियम भर रहे हैं। यह एक तरह का 'हिडन टैक्स' है जो बैंकों के नेट इंटरेस्ट मार्जिन पर दबाव डालता है।

निवेशकों के लिए क्यों है यह जरूरी?

निवेशकों को दो बड़ी चिंताओं पर ध्यान देना चाहिए। पहला, यह प्रीमियम का पैसा डिपॉजिट इंश्योरेंस फंड में लॉक हो जाता है, जिसका उपयोग बैंक लोन देने या डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर को बेहतर बनाने में कर सकते थे। दूसरा, यह एक कृत्रिम लागत ढांचा तैयार करता है। चूंकि कमर्शियल बैंकों का रिकवरी मैकेनिज्म बहुत मजबूत है, इसलिए वहां डिफॉल्ट की संभावना बेहद कम होती है। जानकारों का मानना है कि 25 साल से ज्यादा का ट्रैक रिकॉर्ड रखने वाले बैंकों को इन प्रीमियम से छूट मिलनी चाहिए, ताकि देश के सबसे स्टेबल फाइनेंशियल संस्थानों की प्रॉफिटेबिलिटी पर बेवजह का बोझ न पड़े।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.