DBS Bank की CEO Tan Su Shan ने कहा है कि भारत में FCNR(B) डिपॉजिट के रूप में आया **$133 अरब** का निवेश ग्लोबल निवेशकों का भारतीय बाजार पर अटूट भरोसा है। हालांकि, इक्विटी से हो रही निकासी के बीच, बैंकों के मार्जिन पर पड़ने वाले असर और रिपेमेंट रिस्क पर निवेशकों को नजर रखनी होगी।
भरोसे का नया प्रतीक
DBS Bank की CEO Tan Su Shan के मुताबिक, $133 अरब का FCNR(B) फंड एक बड़ा 'वोट ऑफ कॉन्फिडेंस' है। यह निवेश ऐसे समय में आया है जब विदेशी निवेशकों ने पिछले दो महीनों में भारतीय इक्विटी मार्केट से $7.76 अरब की बड़ी निकासी की है। यह डिपॉजिट लंबी अवधि का निवेश है, जो बाजार की अस्थिरता के दौरान भी टिके रहने की क्षमता रखता है।
बैंकिंग सेक्टर के लिए चुनौतियां
निवेशकों को सिक्के के दूसरे पहलू को भी समझना होगा। हालांकि ये डिपॉजिट रुपये को सहारा दे रहे हैं, लेकिन बैंकों की लागत (Deposit Cost) बढ़ रही है।
- बैंक मार्जिन: बढ़ती लागत से नेट इंटरेस्ट मार्जिन पर दबाव है।
- इंटरेस्ट रेट: 7 अक्टूबर 2026 को Reserve Bank of India द्वारा रेपो रेट को 5.50% पर बढ़ाने के बाद से माहौल और भी चुनौतीपूर्ण हो गया है।
- क्लिफ इफेक्ट: एनालिस्ट्स आगाह कर रहे हैं कि भविष्य में बड़े रिपेमेंट ऑब्लिगेशन से लिक्विडिटी पर दबाव पड़ सकता है, जिसे संभालना बैंकों के लिए एक बड़ी चुनौती होगी।
लंबी अवधि का विजन
Tan Su Shan ने जोर दिया कि भारत अब सॉफ्टवेयर और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर (UPI, GST) के बाद हार्डवेयर मैन्युफैक्चरिंग की ओर बढ़ रहा है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और प्रिसिजन इंजीनियरिंग जैसे सेक्टर्स में लीड करने के लिए यह बदलाव जरूरी है।
अगले कुछ क्वार्टर्स में निवेशकों के लिए यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या विदेशी निवेशकों का फोकस इक्विटी से शिफ्ट होकर लॉन्ग-टर्म FDI की ओर बढ़ता है, और बैंकिंग सेक्टर बढ़ते डिपॉजिट कॉस्ट को कैसे मैनेज करता है।
