भारतीय बैंकिंग सेक्टर में साइबर हमलों की घटनाएं तेजी से बढ़ रही हैं, जिसके चलते इंश्योरेंस क्लेम **₹150 करोड़** के पार पहुंच गए हैं। AI-आधारित खतरों और थर्ड-पार्टी रिस्क के चलते अब बैंकों की सुरक्षा व्यवस्था पर बड़ा दबाव है।
भारत का बैंकिंग सेक्टर इन दिनों अत्यधिक जटिल साइबर हमलों की चपेट में है। State Bank of India, Bank of Baroda और AU Small Finance Bank जैसे प्रमुख संस्थानों में सुरक्षा संबंधी हालिया घटनाओं ने फाइनेंशियल इकोसिस्टम की कमजोरियों को उजागर कर दिया है। इसका सीधा असर इंश्योरेंस सेक्टर पर पड़ रहा है, जहां कुल साइबर-संबंधित क्लेम ₹150 करोड़ के स्तर को पार कर गए हैं। गौर करने वाली बात यह है कि महज 5 साल पहले यह आंकड़ा ₹25 करोड़ से ₹75 करोड़ के बीच ही सिमटा हुआ था।
थर्ड-पार्टी रिस्क बना चुनौती
हाल ही में AU Small Finance Bank का मामला इस बात का उदाहरण है कि खतरा सिर्फ बैंक के भीतर नहीं, बल्कि उनके द्वारा उपयोग किए जाने वाले थर्ड-पार्टी सॉफ्टवेयर में भी छिपा हो सकता है। बैंक फिलहाल Salesforce पर होस्ट किए गए एक प्लेटफॉर्म से संभावित डेटा लीक की जांच कर रहा है, हालांकि बैंक ने स्पष्ट किया है कि उसका कोर बैंकिंग सिस्टम सुरक्षित है। Salesforce ने भी अपनी तरफ से किसी सुरक्षा खामी से इनकार किया है, लेकिन यह घटना बैंकों के लिए डिजिटल नेटवर्क की सुरक्षा को लेकर एक चेतावनी है।
AI का बढ़ता खतरा
साइबर अपराधियों ने अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का इस्तेमाल शुरू कर दिया है, जिससे वे बैंकिंग सिस्टम में कहीं ज्यादा गहराई तक सेंध लगा पा रहे हैं। अब ये हमले केवल रैनसमवेयर तक सीमित नहीं रहे, बल्कि हाई-वैल्यू डेटा ब्रीच में बदल गए हैं। इसके चलते बैंकों को फॉरेंसिक ऑडिट, लीगल सपोर्ट और रेगुलेटरी फाइन जैसे बड़े खर्चों का सामना करना पड़ रहा है।
RBI की बढ़ती सख्ती
बढ़ते खतरों को देखते हुए रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) ने अपनी निगरानी बढ़ा दी है। केंद्रीय बैंक अब बैंकों से साइबर सुरक्षा और AI खतरों से निपटने की तैयारी के कड़े सबूत मांग रहा है। इन मानकों को पूरा करने के लिए बैंकों का ऑपरेशनल खर्च बढ़ना तय है। वहीं, बढ़ते क्लेम्स के कारण भविष्य में साइबर इंश्योरेंस के प्रीमियम में भी इजाफा हो सकता है, जिससे बैंकिंग कंपनियों के मुनाफे पर असर पड़ने की संभावना है। निवेशकों को अब इस बात पर नजर रखनी होगी कि बैंक अपने डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और थर्ड-पार्टी सॉफ्टवेयर को कैसे मैनेज करते हैं।
